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PARADISE III~ MANDIR

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PARADISE III~ MANDIR

Post by smenaria on Sun Jun 17, 2012 2:49 pm



Third creation of paradise series is a poem about a little girl and cruel rules of our society. It creates a satire on our society and even on god.

The creation is narrated(dark blue) and self described(blue). Narration is somehow complex but self description is in childish language and thus becomes very filling full.

मंदिर

छोटा सा उसका गाँव था जैसा उसका दिल,
घर से स्कूल और स्कूल से घर, यही थी मंज़िल,
घर में थे माँ-बाप और उसका प्यारा भाई,
आँखो में कुछ ख्वाब थे पर मन में ग़रीबी समाई.

जब रास्ता पैरो से मापते थे तो रास्ते में कुछ ताकते थे,
बच्चो के मन थे, बाकी बस में नही जानते थे,
पैसो की मिलती है मिठाइयाँ, पैसो की खुशिया,
होली के रंग थे इसके, लक्ष्मी जी की दीवालिया,

उन्हे नही पसंद अंधेरा, पर कहाँ से आए उजाला?
जब उजाला ही डरे अंधेरे से, द्स्तूर था निराला,
पुराने कपड़े थे, दिन भी नही होते थे नये,
आँखो में बस एक जगह थी, जहाँ पर नही थे गये.


गाँव का जो मंदिर था, वा मंदिर शिवजी का,
वही पर उनका दिल था, डर था पंडित जी का,
माँ अक्सर कहती थी, वहा पर मत जाना,
हम दलित है, हमको वहाँ नही हैं जाना.

उसके अंदर कुछ था, जिसे लोग भगवान कहते हैं,
सब वहाँ क्यू जाते हैं, वो तो सबके दिल में रहते हैं,
हम दलित हैं और हमको वहाँ नही है जाना,
तो हमारे घर में तस्वीर क्यों हैं? उसका कैसे हुआ आना?

वही तस्वीर जो घर की अलमारी में हैं,
वही बाबा जो त्रिशुलधारी हैं,
माँ उसको छूपाती हैं जब बरसात आती हैं,
हमारी छत जो टपकती हैं, जब बरसात आती हैं.

ये बद्रा क्यूँ छाती हैं? ये बरसात क्यूँ आती हैं?
सब गीला हो जाता हैं घर में, और हमको भी भिगाती हैं,

उसका भाई भीग गया बरसात में और बीमार हो गया.
धुजने लगा ठंड से और बीना कंबल के सो गया.

दवा से ज़्यादा होती है दुआ, उसने सुना था,
भगवान पड़े गठरी में, वो कोना सूना था,
उसे याद आया वो मंदिर जिसमे बड़े भगवान थे,
वो तो थी ग़रीब, शायद वो ही धनवान थे.

वो दौड़ी मंदिर की और, वही ठिकाना था,
उसके मन में ईश्वर थे, पर ज़ालिम जमाना था,
क्याँ गुस्ताख़ी थी, उन्हे रास ना आई ढीठता,
इंसान तो इंसान हैं, पर ग़रीबी का दाग नही मीटता.

दलित थे वो और दलितो को वहा नही जाना था,
भूल गयी वो, माँ का कहना नही माना था,
पुजारी ने मारा उसे, माँ ने भी फटकारा,
वो अकेली रोती रही, ईश्वर भी ना हुआ सहारा.

हम क्या बनाने आए थे, और क्या बना गये,
कही मंदिर, कही मस्जिद, कही गिरजाघर बना गये,
हमसे अच्छे तो वो परिंदे हैं शायद,
कभी मंदिर, कभी मस्जिद, कभी गिरजाघर सजा गये.

ईश्वर को भी कर दिया अपना-पराया,
अब तो समझो, ईश्वर तो दिल में समाया,
हर इंसान के दिल में रहता हैं, वही हैं ठिकाना,
तुम क्या घर बनाओगे उसका? जिसने तुम्हे बनाया..
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