SB Creations- Let Us Be Creative


SB Creations में आपका हार्दिक स्वागत हैं. इस वेबसाइट पर मेरी कहानीया, कविताये, लेख, समाज से जुडी जानकारिया आदि हैं. इन्हें पढ़े एवं शेयर करे.

धन्यवाद...

सुमित मेनारिया
⇧⇧CLICK HERE TO HIDE THIS BAR
Latest topics
» About SB Creation
Sat Jan 21, 2017 2:25 pm by smenaria

» ताश्री...Don't Look into her eyes!
Fri Jul 08, 2016 12:47 pm by smenaria

» The Hell Lovers (स्वास्तिक)....A Love Against the God 【preview- हिंदी में】
Fri Jun 17, 2016 2:29 pm by smenaria

» The Hell Lovers-Pictures
Thu Oct 03, 2013 5:36 pm by smenaria

» Swastik- The Story
Thu Oct 03, 2013 5:32 pm by smenaria

» Poelogues- Concepts
Thu Oct 03, 2013 5:28 pm by smenaria

» Introduction
Thu Oct 03, 2013 5:21 pm by smenaria

» सभ्य व्यक्ति
Thu Apr 18, 2013 7:18 pm by smenaria

» मुनि, बहूं & वृद्ध पुरुष
Thu Apr 18, 2013 7:09 pm by smenaria

Social bookmarking

Social bookmarking digg  Social bookmarking delicious  Social bookmarking reddit  Social bookmarking stumbleupon  Social bookmarking slashdot  Social bookmarking yahoo  Social bookmarking google  Social bookmarking blogmarks  Social bookmarking live      

Bookmark and share the address of SB Creations- Let Us Be Creative on your social bookmarking website


ताश्री...Don't Look into her eyes!

Page 2 of 3 Previous  1, 2, 3  Next

View previous topic View next topic Go down

6. राणा

Post by smenaria on Fri Jun 17, 2016 12:19 pm

एसीपी नंदिनी और इंस्पेक्टर विजय काफी देर से कुछ चर्चा कर रहे थे.
...तो मैडम यह हैं महेंद्र प्रताप के व्यवसाय का पूरा कच्चा-चिट्ठा. कहने को तो बहुत बड़े उद्योगपति हैं लेकिन शहर के सारे काले कारनामें यही सम्भालता हैं.
ठीक हैं...कल इससे भी मिल लेते हैं. तुम बात कर लेना कि एसीपी मिलना चाहती हैं.
जी..मैडम.
अब मैं घर के लिए निकल रही हूँ.
नंदिनी यहाँ उनको मिले सरकारी क्वार्टर में ही रह रही थी. उनके पास खुद का घर तो पहले भी नही था. वो अनाथ थी और यहाँ के एक अनाथाश्रम में ही पली थी. बचपन से ही पढाई-लिखाई में अव्वल थी, तो अनाथाश्रम ने भी उसकी पढाई लिखी में कोई कसर नही छोड़ी थी. विशेषतः उनकी अंजनी माँ ने...वो वहां की संचालक थी. अनाथाश्रम का सारा काम वही देखती थी. उनको नंदिनी से विशेष लगाव था. बचपन से ही उसको बहुत प्यार से पाला था. नंदिनी ट्यूशन के लिए तो उन्होंने खुद पैसे दिए थे. नंदिनी भी उनकी उम्मीदो पर खरी उतरी थी. एक के बाद एक परीक्षा प्रथम प्रयास में ही पास करती गयी थी. आज वो अपनी काबिलियत के कारण ही एसीपी बन पायी थी. मुंबई जाने के बाद कई दिनों तक तो वो रोज अंजनी माँ से फोन पर बात करती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसका बात होना कम होता गया. अब तो उनका फोन भी नही लगता था. नंदिनी ने सोचा था कि आते ही उनसे मिलूंगी लेकिन यहाँ थाने के काम समझने में इतनी व्यस्त हो गयी कि सुबह से शाम तो थाने में ही हो जाती थी. उसने निश्चय कर लिया कि कम तो वो किसी भी हाल में अनाथाश्रम जाकर ही रहूंगी.
अगले दिन नद्निनी और विजय महेंद्र प्रताप से मिलने जा रहे थे. विजय जीप ड्राइव कर रहा था और नंदिनी पास वाली सिट पर बैठी थी.
...तो विजय तुम्हे उस लड़की की लाश कहाँ मिली थी?
कौन मैडम?
वो ताश्री!
हमारे पास एक फोन आया था, पास के एक जंगल में किसी लड़की की लाश पड़ी हैं. उसके पास ही एक बैग था, जिसमे उसकी आईडी और मोबाइल था. वो आईडी और मोबाइल ताश्री के ही थे. हमने उसकी माँ को बुलाकर शिनाख्त करवाई तो वो ताश्री ही थी.
रेप जैसा कुछ था क्या?
नही मैडम ऐसा तो कुछ नही था. वैसे पोस्टमार्टम में ज्यादा कुछ नही आ पाया था, लाश काफी पुरानी हो चुकी थी.
तो तुमने उसके बॉयफ्रेंड को दोषी कैसे माना था?
वो लड़की आखिरी बार उसके साथ ही देखी गयी थी. उसकी माँ ने भी बताया था कि अंतिम बार वो जब ताश्री से मिली थी तो वो अपने बॉयफ्रेंड के साथ कही जाने की बात कर रही थी. उसके बाद हफ्ते भर तक उसका कुछ अता पता नही था. और फिर हमें वो लाश मिली...
तो तुम्हे उसके बॉयफ्रेंड का कोई सुराग मिला था.
नही... वो फरार हो गया था. वैसे एक अन्दर की बात बताऊँ. इस केस में कुछ बड़े नाम भी आये थे, जिसके कारण इसकी जांच ज्यादा आगे नही बढ़ पायी थी.
बड़े नाम? नंदिनी ने चौंकते हुए पूछा. जैसे कि...
एक के यहाँ तो हम अभी जा रहे हैं.
महेंद्र प्रताप? नंदिनी ने आँखे फाड़कर पूछा.
नहीं..उनके बड़े भाई...ठाकुर प्रताप उर्फ़ राणा ठाकुर.

__________________________________________________

जीप महेंद्र प्रताप के घर के बाहर आकर रुकी. घर क्या था, यह तो एक आलिशान महल था. दरवाजे के पास ही दो हट्टे-कट्टे लोग हाथ में बंदूके थामे खड़े थे. नंदिनी को देखते ही दोनों चौकन्ने हो गए. उन्होंने इसे दरवाजे पर ही रोक लिया. नंदिनी ने उन्हें घुर कर देखा लेकिन उन पर कोई असर न हुआ. तभी विजय बोला, ‘प्रताप साहब से मिलना हैं, 12.०० बजे की अपॉइंटमेंट ली हुई हैं. ‘अपॉइंटमेंट` सुन कर नंदिनी ने विजय की तरफ देखा लेकिन वो नज़रे चुरा रहा था.
आप आधा घंटा बेठिये, साहब खाना खा रहे हैं. गार्ड ने बाहर पड़ी बेंच की और इशारा करते हुए कहा.
मेरे पास एक इससे बेहतर रास्ता हैं, नंदिनी गुस्से से बोली. विजय इन दोनों को हथकड़ी लगाओ और जीप में बिठाओ. दो दिन जेल की हवा खायेंगे तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी इनकी.
मैडम मेरी बात तो सुनिए...विजय गिडगिड़ाया.
ठहरिये! हम बात करते हैं. एक गार्ड बोला. उसने फोन निकला और फोन लगाया.
होकम, कोई पुलिस साहिबा आपसे मिलना चाहती हैं. ...12.00 बजे के अपॉइंटमेंट के लिए बता रहे हैं.....नही होकम संभव नहीं हो पा रहा हैं....जो हुकुम.
आप जा सकते हैं मैडम. चौकीदार ने फोन रखते हुए कहा.
अन्दर हवेली काफी शानदार बनाई हुई थी. यह बाहर से जितनी खुबसूरत दिखती थी अन्दर से उससे भी ज्यादा खुबसूरत थी. फर्श पर सुन्दर संगमरमर लगता था. छत पर सुन्दर नक्काशी के बीच लगे सुन्दर झूमर किसी राजा के महल जैसे अनुभव देते थे.
सामने बड़ा खाने का टेबल लगा हुआ था, इसके चारो तरफ कुर्सियां लगी थी और उसके एक सिरे पर राजशी कोट और पूरी सफ़ेद पोशाक में तीखी मुच्छो वाला एक आदमी बैठा हुआ, यहीं महेंद्र प्रताप था.
बैठिये मैडम, बैठिये. प्रताप ने पास ही पड़े एक सोफे की तरफ इशारा करते हुए कहा.
मेरा भोजन हो ही गया हूँ.
नंदिनी और विजय सोफे पर बैठ गये. कुछ ही देर में महेंद्र प्रताप भी आ गया.
..और भाई विजय क्या हाल चाल हैं, क्या बात हैं आजकल तो तुम्हारा आना होता ही नही हैं इस तरफ.
जी वो बस काम की व्यस्तता हैं बाकि तो आता ही रहता हैं...
प्रताप साहब में आपके व्यवसाय के सिलसिले में आपसे कुछ बात करना चाहती हूँ. नंदिनी ने बात बीच में काटते हुए कहा.
जी कहिये. प्रताप ने थोड़ा आगे झुकते हुए कहा.
शहर में आपके बहुत-से शराब के ठेके, होटले और शराब के ठेके हैं....
हाँ लेकिन वो सब वैध हैं. हमारे पास सबके लाइसेंस हैं. प्रताप बीच में ही बोला.
नंदिनी एक पल रुकी और फिर प्रताप की आँखों में आँखे डालते हुए बोली. जी हाँ बिलकुल...लेकिन आपके नाईट क्लब्स में नशाखोरी होती हैं, कई शराब के ठेकों पर नकली शराब बेचीं जाती हैं और होटलों में खुले आम जिस्मफरोशी होती हैं.
क्या बकवास कर रही हैं? जानती हैं किसपर इल्जाम लगा रही हैं आप? प्रताप ने गुस्से में आकर कहा.
मैं बकवास कर रही हूँ या सच कर रही हूँ या सच कह रही हूँ , वो तो आपको जल्द ही पता चल जाएगा. बेहतर हैं कि वक़्त रहते आप अपने काले कारनामें बंद कर दे. वर्ना मुझे अपनी कार्यवाही करनी पड़ेगी.
पुलिस का रॉब किसे दिखाती हैं? तुझ जैसी पुलिस वालियाँ मेरी जेब में रहती हैं. परताप अब पुरे गुस्से में आ चूका था. तभी पीछे से एक आवाज आई.
अपनी आवाज ज़रा नीचे करो महेंद्र.
महेंद्र प्रताप अपनी जगह पर खड़ा हो गया, साथ ही विजय भी खड़ा हो गया. नंदिनी भी उन्हें देख कर खड़ी हो गयी. यही राणा साहब हैं. विजय नंदिनी के कान में बुदबुदाया.



महेंद्र प्रताप अपनी जगह पर खड़ा हो गया, साथ ही विजय भी खड़ा हो गया. नंदिनी भी उन्हें देख कर खड़ी हो गयी. यही राणा साहब हैं. विजय नंदिनी के कान में बुदबुदाया.
वो दादा ये...महेंद्र धीरे से बुदबुदाया.
होटल पद्मिनी से फोन आया था, वहां स्विमिंग पूल में कोई हादसा हो गया हैं. आपको जाकर देखना चाहिए. राणा सीढियों से नीचे उतारते हुए बोले.
जी दादा... महेंद्र मिमियाया और नंदिनी को घूरते हुए निकल गया.
मैं महेंद्र की ओर से आपसे माफ़ी मांगता हूँ मैडम. ये व्यवसाय करना तो सीख गए हैं लेकिन स्त्रियों का सम्मान करना अब तक नही सीख पाए हैं. राणा महेंद्र के जाने के बाद बोले.
जी कोई बात नही...मैं समझ सकती हूँ. नंदिनी धीरे से बोली.
बैठिये मैडम बैठिये. क्या लेगी आप..चाय, कोफ़ी, शरबत या और कुछ?
जी कुछ नही. नंदिनी ने बैठते हुए कहा.
ऐसे कैसे कुछ नही...काका! चाय-नाश्ता लेकर आओ. ठाकुर साहब ने अपने नौकर को आवाज लगाते हुए कहा.
जी मैडम कहिये...क्या कह रही थी आप?
ठाकुर साहब आपके कुछ व्यवसाय में गलत काम हो रहा हैं. पिछले महीने ही आपके एक शराब के ठेके से नकली शराब पीने से कुछ लोगो की मौत हो गयी थी.
हाँ मैडम...हमें सुचना मिली थी....तब हमने खुद ही उस ठेके को बंद करवाकर वहां के ठेकेदार को पुलिस के हवाले कर दिया था और मरने वालो को क्षतिपूर्ति भी दी थी.
...लेकिन राणा साहब...बहुत सी और भी ऐसी चीजे हैं जो सही नही हैं.
देखिये एसीपी साहिबा. व्यवसाय लड़की के ब्याह जैसा होता हैं, हज़ार तरह के लोगो का ख्याल रखना होता हैं, थोडा बहुत ऊपर नीचे तो चलता रहता हैं. उम्मीद हैं आप भी समझती होगी. फिर भी अगर आपको कोई विशेष आपत्ति हो तो बता दीजियेगा हम दिखवा देंगे.
शुक्रिया राणा साहब...विजय के जरिये मैं आपको आवश्यक मामलो से अवगत कराती रहूंगी. अच्छा अब मैं चलती हूँ.
अरे आपने तो नाश्ता वगेरह कुछ नही लिया. कोई बात नही... ज़रा एक पल ठहरिये.... काका! ज़रा तोहफा लाना.
काका एक पार्सल लेकर आ गए. नंदिनी राणा को घूरने लगी.
इसे रिश्वत मत समझिये मैडम. हमारे घर का रिवाज हैं कोई भी मेहमान पहली बार आता हैं तो उसे खाली हाथ नही भेजते.
नंदिनी ने कुछ देर सोचा और फिर बोली.
शुक्रिया राणा साहब! मैं तो यह तोहफा नही ले सकती लेकिन अगर आप देना ही चाहते हैं तो मेरी तरफ से किसी अनाथालय में दान कर दीजियेगा.
राणा मुस्कुराए. बेशक जैसा आप कहे मैडम....काका! जैसा इन्होने कहा हैं, इसे किसी अनाथालय में दान करवा दीजियेगा. और कुछ सेवा हो तो बताइए मैडम.
जी शुक्रिया...और कुछ नही... इसके बाद नंदिनी और विजय बाहर आ गए.
रास्ते में विजय और नंदिनी काफी समय तक खामोश रहे. शायद विजय को अब नंदिनी से डर लग रहा था.
यह राणा ठाकुर किस तरह का आदमी हैं? नंदिनी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा.
सच कहूँ मैडम तो राणा एक बंद किताब की तरह हैं, कोई उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता...लेकिन एक बात मैं अच्छी तरह से जानता हूँ, राणा जो दीखता हैं वो हैं नही..और वो जो हैं वो कभी सामने नही आता.
मतलब?
मतलब यह कि महेंद्र एक मोहरा मात्र हैं, सारा कारोबार राणा खुद सम्भालता हैं लेकिन हमेशा प्रताप को आगे रखता हैं.
...लेकिन मुझे तो वो काफी अच्छा आदमी लगा...नंदिनी ने दूसरी तरफ देखते हुए कहा.
लोग उसे बातो का जादूगर कहते हैं. अपनी बातो से दूसरो को वश में करना और अपना मतलब निकालना उसे बखूबी आता हैं.
ये कारोबार इसका पुश्तेनी हैं? नंदिनी ने सामने देखते हुए कहा.
कहाँ मैडम? ये सब इसने खुद खड़ा किया हैं वो भी केवल 20 सालों में...इससे पहले राणा को कोई जानता तक नही था, पता नही कहाँ से आया और कैसे इतना बड़ा कारोबार खड़ा कर दिया?
नंदिनी और विजय थाने पहुँच चुके थे. विजय अब मैं घर जा रही हूँ, कुछ जरुरी काम से जाना हैं.
जी मैडम, बाकी काम मैं संभाल लूँगा.
घर से नंदिनी सीधे अनाथालय गयी. वहां पहुँचते ही पुरानी सहेलियों ने उसे घेर लिया. वो काफी देर तक उनसे बात करती रही . उसकी सहेलियां भी अपनी दोस्त को एसीपी के रूप में देखकर गर्व महसूस कर रही थी. काफी देर तक उनसे बात करने के बाद नंदिनी को अंजनी माँ का ख्याल आया.
अंजनी माँ कहीं नज़र नही आ रही. नंदिनी ने पूछा.
वो अब नही आती. एक सहेली ने जवाब दिया.
क्यों?
उनके कुछ प्रॉब्लम हो गयी थी, उसके बाद उन्होंने यहाँ आना बंद कर दिया था. अब दूसरी वार्डन संभालती हैं.
नंदिनी को बहुत बुरा लग रहा था. इतने दिनों बाद आई थी लेकिन अंजनी माँ से नहीं मिल पायी थी.
avatar
smenaria
Admin

Posts : 96
Points : 218
Reputation : 0
Join date : 02.05.2012
Age : 27
Location : The Hell

View user profile http://menaria.me.cc

Back to top Go down

7. विश्वास

Post by smenaria on Fri Jun 17, 2016 12:22 pm

24/01/2014

ज़िन्दगी में विश्वास सबसे बड़ी चीज हैं, इसे बनाने में उम्र गुज़र जाती हैं लेकिन टूटने में एक पल भी नही लगता.
आज सुबह से एक ही उधेड़बुन थी कि अंतस से मिलूं या न मिलूं. पिछली बार जब उससे मिली थी तो उसने मुझे एक अजीब पशोपेश में डाल दिया था. उससे मिलने का निर्णय मुझे खुद ही करना था. अगर मैं उससे न मिलूं तो कोई फर्क नही पड़ेगा, सब जैसा हैं वैसा ही चलता रहेगा लेकिन बहुत सी ऐसी बातें जो मैं जानना चाहती हूँ नही जान पाउंगी.
लेकिन क्या मेरे लिए जानना इतना ही जरुरी हैं? रोहित ने जब मुझे कहा था कि कोई मुझसे प्यार नही कर सकता तो मेरे अन्दर एक अजीब डर बैठ गया था. क्या मैं सच में ऐसी थी कि कोई मुझसे प्यार नही कर सकता? तो फिर अंतस क्यों मेरे पीछे पड़ा था? कही वो मुझे फंसाने के लिए कोई जाल नही बन रहा था? मैंने लोगो को जिज्ञासा की अक्सर बड़ी कीमत चुकाते हुए देखा हैं..मैं इस सब के लिए तैयार नही हूँ. मुझे अब कोई मुसीबत नही मौल लेनी. मुझे ख़ास नही बनना...मैं आम ही ठीक हूँ. मैनें फैसला कर लिया हैं मैं अब अंतस से नही मिलूंगी.
इसी उधेड़बुन में तैयार हो रही थी कि जैसे ही बैग उठाया मुझे याद आया कि आज तो मुझे नया बैग लेना हैं. मैंने फटाफट किताबे नए बैग में भरी और कोलेज के लिए रवाना हो गयी.
कोलेज में भी आज मन नही लग रहा था. पूजा भी दो पीरियड बाद आई थी.
इतनी लेट क्यों आयी? उसके आते ही मैंने पूछा.
वो कुछ काम आ गया था यार.
हाँ मुझे पता हैं तेरे सारे काम... मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
मतलब? उसने बुरा सा मुंह बनाया.
कल तू किसके साथ थी बाइक पर?
कौन सी बाइक? मैं तो ऑटो से घर गयी थी.
उसका चेहरा देख कर पता चल रहा था कि वो साफ़ झूठ बोल रही थी.
झूठ मत बोल... तू कल एक ग्रीन टी-शर्ट वाले लड़के के साथ नही थी? मॉल के बाहर से निकली थी.
नही तो...कल तो मैं पुरे दिन घर से बाहर ही नही निकली...घर पर ही आराम कर रही थी. वैसे तेरा उस लड़के के साथ क्या चक्कर हैं? उसने अचानक तीर मेरी मोड़ दिया.
कौन...कौनसा लड़का?
वही...जिसको कल तू हॉस्पिटल ले कर गयी थी. सब बात कर रहे थे. उसने मेरे ही अंदाज़ में कहा.
मैं तो उसे जानती तक नही हूँ. कुछ दिन पहले कुछ लडको ने मुझे छेड़ा था तो उसने उन्हें पीटा था, अब वापस में उन्होंने बदला लेने के लिए उसे पीट दिया. इसी लिए मैं उसके साथ हॉस्पिटल गयी थी. मैंने सफाई देते हुए कहा.
कोलेज ख़त्म होने पर हम दोनों बाहर निकली तो सामने ही अंतस खड़ा था.
लो आ गये आपके आशिक! पूजा ने मुझे छेड़ते हुए कहा.
भाड़ में जाए. मैंने गुस्से से कहा और आगे बढ़ गयी.
तो फिर तुमने क्या सोचा हैं? अंतस मेरे पास आकर बोला.
तुम यहाँ कोलेज के बाहर क्यों खड़े रहते हो...मुझे बदनाम करोगे क्या?
तो कहाँ मिलना चाहोगी?
मुझे कही नही मिलना..आज के बाद मेरा पीछा मत करना.
तो ये तुम्हारा अंतिम निर्णय हैं? वो जहाँ था वही खड़ा हो गया.
अंतिम और प्रथम..जो समझो वो यहीं हैं. मैंने ऑटो में बैठते हुए कहा.

घर आकर मैं सो गई. खाना भी नही खाया. मैंने अंतस को तो मना कर दिया था लेकिन शायद अन्दर ही अन्दर कहीं मैं भी उससे बात करना चाहती थी. बड़ी अजीब बात है मैं खुद नही जानती कि मैं क्या चाहती हूँ?
मैं उठी तब तक माँ भी आ चुकी थी.
तुमने खाना नही खाया? माँ ने कमरे में आते हुए पूछा.
वो भूख नही थी माँ.
इस उम्र का पता नही भुख से क्या दुश्मनी हैं? अच्छे-अच्छो की भूख मर जाती हैं. तबियत तो ठीक हैं तेरी?
ठीक हैं माँ...आप आज जल्दी आ गयी.
वो एक फंक्शन था सो मैं जल्दी फ्री हो गयी. माँ मेरे इधर उधर पड़े कपडे समेटने लग गयी. इतने में उनकी नज़र मेरे बैग पर पड़ी.
तू नया बैग ले आई?
उस बैग की चैन सही ही नही हो रही थी और वो पूरा ख़राब भी हो गया था.
ठीक हैं...लेकिन ये पुराना तो स्टोर में रख कर आ...सारा कचरा अपने कमरे में ही जमा कर के रखेगी क्या? मैं चाय बना रही हूँ साथ में कुछ नाश्ता कर लेना.
माँ के जाते ही मैंने मोबाइल निकाला और फेसबुक चालू कर दिया.
कुल ३९ नोटिफिकेशन थे, कुछ किसी की टैग की हुई फोटो पर लाइक और कमेंट के थे, कुछ किसी जबरन एड किये हुए ग्रुप के पोस्ट थे, दो चार हाय हेल्लो के मेसेज थे. दो ही काम के थे. एक तो ये कि मेरी कविता के 17 लाइक आये थे और तीन कमेंट थे. एक कमेंट इस ब्रह्म राक्षस का था... अंतस का.
जो उलझे-उलझे रहते हो, ये सवाल किसका हैं?
जो डूबे डूबे रहते हो ,ये ख्याल किसका हैं?
यूँ तो बहुत कहते थे, याद न आएगी मेरी,
जो बुझे बुझे रहते हो, ये मलाल किसका हैं?
अजीब आदमी हैं? पीछा ही नहीं छोड़ता हैं. फिर नीचे देखा, ये तो तीन दिन पहले किया हुआ कमेंट था.
इतने में माँ चाय लेकर आ गयी.
तू अब इस मोबाइल में घुस गयी. तुम खुद का ख्याल कब रखोगी श्री?
आप जो हो मेरा इतना ख़याल रखने के लिए...मैंने माँ को प्यार से बाहोँ में भरते हुए कहा.
तू चाय गिरा देगी. माँ ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा. मुझे मस्का मत लगा और फटाफट मुंह धो ले. माँ चाय रखकर बाहर चली गयी.




मैंने चाय पी और फिर बैग को लेकर स्टोर रूम में पहुंची. अन्दर बहुत भीड़ हो रखी थी. पता नही माँ ने भी क्या-क्या सामान इकट्ठा कर रखा था? एक और पापा का गिटार पड़ा था, माँ कहती थी पापा को गिटार बजाने के बहुत शौक था, एक तरफ मेरी बचपन की किताबे पड़ी थी. मेरी तीन पहियों वाली साइकिल तक माँ ने सम्भाल कर रखी हुई थी. मुझे बैग रखने की कहीं जगह ही नहीं मिल रही थी. मैंने एक टुटा स्टूल लिया जो कम से कम मेरा वजन सँभालने के तो लायक लग रहा था. उस स्टूल को थोड़ी जगह कर बीच में रखा और उस पर पैर रखकर ऊपर ताक में देखा. वहाँ भी काफी सामान पड़ा था लेकिन थोड़ी बहुत जगह दिख रही थी, मैंने वही बैग रखा और वापस नीचे उतर गयी. मैं लाइट बंद कर बाहर आने ही वाली थी कि अचानक ठिठक गयी. मैंने ऊपर काले रंग का एक बक्सा देखा था. उस बक्से पर एक त्रिशूल का निशान था. मैंने यह त्रिशूल कहीं न कहीं देखा था. हाँ! याद आया...यहीं तो मेरे सपने में तांत्रिक के हाथ में था. लेकिन ये निशान मेरे सपने में कैसे आ सकता हैं? मैं वापस उपर चढ़ी और उस डिब्बे को नीचे उतार लिया. उस पर काफी धुल जमी हुई थी. उसमें एक लाल कपडा और एक तस्वीर उलटी करके रखी हुई थी. मैंने जब उस तस्वीर को सीधा करके देखा तो मेरे पांवो तले ज़मी खिसक गयी. इस तस्वीर में एक आदमी के साथ शादी के जोड़े में मेरी माँ थी और वो आदमी मेरा पिता तो नही था.
-------------------------
मैंने वो तस्वीर लेकर बक्सा वापस ऊपर ही रख दिया. मैं तस्वीर लेकर वापस कमरे में आ गयी. मैं उस तस्वीर को घूरे जा रही थी और मेरी आँखों से धारा बह रही थी. मुझे उस तस्वीर पर ज़रा भी विश्वास नही हो रहा था. क्या सच में मेरी माँ की दूसरी शादी हुई थी? क्या मेरी माँ ने पूरी ज़िन्दगी मुझसे झूठ बोला था? क्या मैं जिसे अब तक अपना पिता समझती थी वो मेरे पिता थे ही नही?
मुझसे सत्य ज्यादा समय तक छुपा नही रह सकता क्योंकि कोई मुझसे छुपा भी नही सकता. मैं किसी की भी आँखों में देखकर वो जान लेती हूँ जो जानना चाहती हूँ. फिर चाहे वो चाहे या न चाहे कोई फर्क नही पड़ता. मैं सबका सच जान लेती हूँ. वलेकिन कई बार मैं वो बातें भी जान लेती हूँ जो मुझे नही जानना चाहिए. इसलिए मुझे सच से नफरत सी हो गयी थी क्योंकि मुझे मालुम था कि सत्य अधिकतर कडवा होता हैं और यह कड़वाहट मैंने अपने जीवन में घुलते हुए देखी थी. एक उम्र तक कोई मेरा दोस्त नही था क्योंकि मैं हमेशा जानती थी कौन-कौन मेरे बारें में क्या सोचता हैं?
लेकिन एक शख्स ऐसा था जिसके साथ इसा नही था. जिसकी आँखों में झाँककर में उसका दिमाग नही पढ़ सकती थी... वह थी मेरी माँ. मुझे हमेशा इस बात की ख़ुशी रही थी क्योंकि सबकुछ न जानकार ही मैं उनसे इतना प्यार कर पाई थी.
लेकिन आज मुझे इसका अफ़सोस था. मैंने जिसके ऊपर सबसे ज्यादा विश्वास किया था उसी ने मेरा विश्वास तोडा था. मैं आज अपने सारें सवालो के जवाब चाहती थी और वो भी बिना अपनी माँ को बिना पूछे. मेरे इन सवालो के जवाब केवल एक ही शख्स दे सकता था...अंतस.

25/01/2013
आज सुबह से सिर दर्द से फटा जा रहा था. नींद किसी दूसरी दुनिया जैसी होती हैं. सारी परेशानियाँ, सारी मुश्किले भूलकर हम उस दुनियां में चले जाते हैं. लेकिन हमें कभी न कभी तो नींद से जागना ही होता हैं, वास्तविकता में आना ही होता हैं.
कितना अच्छा हो अगर हम उस दुनियां में ही रहे. जब कभी भी हमारे साथ कुछ बुरा होता हैं तो हमें लगता हैं कि काश वो दिन एक बुरा सपना हो जो कि नींद खुलते ही चला जाए.
मैंने घडी की ओर देखा तो नौ बजने को आये थे लेकिन उठने की इच्छा ही नही हो रही थी. आखिर उठ कर करना भी क्या था?
तभी माँ कमरे में आई. अब तक उठी नही, तबियत ठीक नही हैं क्या? उन्होंने अस्त-व्यस्त पड़े कपडे उठाकर अलमारी में रखते हुए कहा.
मैंने कुछ नही कहा.
जल्दी उठ जा...चाय भी ठंडी हो गई हैं. मैं वापस बनाऊं या तू बना लेगी.
मैं खामोश ही शुन्य में ताकती रही. अजीब बात हैं जिस इंसान से मैं इतना प्यार करती थी आज मुझे उससे बात करने में भी घुटन हो रही थी.
कोलेज नही जाएगी क्या?
नही...मैंने बस इतना सा कहा और वापस कम्बल से अपना मुंह ढँक लिया.
माँ चली गयी. उनके जाते ही मैंने उस तस्वीर को निकाला और फिर गौर से देखा. ऐसा लगा तस्वीर के दोनों शख्स मुझ पर हंस रहे हो.
मैंने अपना फोन निकाला और अंतस को मेसेज किया. मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ.
कुछ ही देर में उसका रिप्लाई आया.
कब?
आज...अभी...
तो फिर कैफ़े में 11 बजे.
नही मैं अकेले में मिलना चाहती हूँ.
मेरे कमरे पर आ सकती हो.
कहाँ?
होटल मीरा में रूम नम्बर 331.
ठीक हैं.
मैं 10.३० बजे तक तैयार होकर घर से निकल गयी. अजीब बात थी एक दिन पहले तक जेस आदमी से बात करने से भी मैं घबरा रही थी , आज उससे मिलने उसके रूम पर जा रही थी. मुझे डर लगना चाहिए था लेकिन नही लग रहा था. शायद मेरे अन्दर का गुस्सा मेरे डर पर हावी हो गया था.
avatar
smenaria
Admin

Posts : 96
Points : 218
Reputation : 0
Join date : 02.05.2012
Age : 27
Location : The Hell

View user profile http://menaria.me.cc

Back to top Go down

8. अनुतरित

Post by smenaria on Fri Jun 17, 2016 12:24 pm

एसीपी नंदिनी ने विजय को आवाज लगायी.
जी मैडम कहिये.
मुझे ये ताश्री केस की फाइल चाहिए.
मैडम आप क्यों गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हो? ये केस कब का बंद हो चूका हैं.
क्या आरोपी जेल में हैं?
नही लेकिन...
तो फिर मुझे फाइल लाकर दो.
जी मैडम.
कुछ ही देर में फाइल नंदिनी के टेबल पर थी. एक डायरी भी थी इसके साथ में...मेरे पास तो फोटोकॉपी हैं. नंदिनी ने फाइल उलटते हुए कहा.
नहीं मैम इसके साथ तो नहीं हैं, शायद एविडेंस बॉक्स में हो.
हाँ...तो लेकर आओ.
मैडम वो एविडेंस तो....विजय रुक गया.
क्या हुआ?
कुछ नही.
तो जाओ.
नंदिनी ने फाइल को खोला. पहले पन्ने पर ही ताश्री का फोटो लगा था. एक प्यारी-सी खुबसूरत लड़की, चेहरा ऐसा की किसी को भी मंत्रमुग्ध कर दे. नीली नीली आँखे जैसे बर्फ के बीच में नीला सागर हो. उसके चेहरे को देख नंदिनी सोच में पड़ गयी. ऐसा लगता था जैसे नंदिनी ताश्री को बरसो से जानती हो. कम से ये आँखे तो उसने कहीं न कहीं देखी थी. उसके बाद एफआईआर, गवाहों के बयान वगेरह दस्तावेज थे और अंत में एक पेज पर क्राइम सस्पेक्ट और एक नाम अंतस.
नंदिनी को आश्चर्य हुआ उसके नाम के अलावा और कोई जानकारी नही थी, न पता...न कोई फोटो!
नंदिनी ने वापस विजय को आवाज दी.
जी मैडम...डायरी तो नही मिली.
‘नही मिली’ का क्या मतलब? उसने विजय को घूरते हुए कहा.

वो सबूतों के साथ तो नही हैं.
...और वो अंतस का फोटो वगेरह भी कुछ नही हैं इस फाइल में.
मैडम इसका फोटो नही मिला था...बल्कि इसके बारे में इसके नाम के अलावा और कोई जानकारी नही मिल पाई थी. कौन था, कहाँ से आया था, क्या काम करता था? कुछ पता नही चल पाया था.
तो तुम लोगो ने इसका स्केच नही बनवाया था?
बनवाया तो था....इसी फाइल में होगा!
इस फाइल में तो कोई स्केच नही हैं.
अजीब बात हैं! तब तो मैडम एसिपी चतुर्वेदी ही बता सकते हैं, वही यह केस देख रहे थे.
हम्म...तो चतुर्वेदी सर को फोन लगाओ और उनसे मेरी बात कराओ.
फोन! जी मैडम....विजय अब कुछ नही बोला. कुछ देर बाद वो वापस आया.
मैडम कल वो किसी काम से जयपुर ही आ रहे हैं. कह रहे हैं थाने आकर आपसे मिल लेंगे.
अच्छी बात हैं. नंदिनी ने फाइल बंद करते हुए कहा.



----------------
मैं होटल पहुंची और उसके कमरे का दरवाजा खटखाया. कुछ ही देर में उसने दरवाजा खोला.
आओ अन्दर आ जाओ.
यह एक फाइव स्टार होटल का शानदार कमरा था. अन्दर तीन-चार अजीबो-गरीब पेंटिंग्स लगी हुई थी. सामने एक ५२” की बड़ी एलइडी टीवी लगी हुई थी. बीच में एक बड़ा सा पलंग था, जिसके पास ही एक टी-टेबल और दो कुर्सियां लगी हुई थी. टी टेबल पर एक गिलास ज्यूस, एक गिलास पानी और एक कॉफ़ी पड़ी थी. ऐसा लग रहा था जैसे पूरी तैयारी कर के बैठा हुआ था. मुझे आश्चर्य हुआ कि आखिर इतना पैसेवाला लड़का मुझ जैसी आम लड़की के पीछे क्यों पड़ा हुआ हैं?
तुम्हे मेरे रूम पर अकेले आते हुए डर नही लगा? उसने मुझे कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा.
क्यों...तुम्हे लगता हैं कि मुझे तुमसे डरने की जरुरत हैं? मैंने उसकी और देखते हुए कहा. मैं जानना चाहती थी कि मेरा उस पर भरोसा करना कितना सही हैं.
नही...बिलकुल नही...लेकिन फिर भी अचानक तुम्हारा इरादा कैसे बदल गया?
तुम मेरे पिता के बारे में क्या जानते हो?
यही की जो तुम जानती हो वो सही नही हैं.
मैंने अपने पर्स से वो फोटो निकाली और टेबल पर रख दी. मैं लगातार उस फोटो को ही ताक रही थी. मेरी आँखे भर आई थी. वो भी कुछ देर तक उस फोटो को घूरता रहा और फिर उसने मेरी तरफ देखा.
तुम्हे यह फोटो कहाँ से मिला?
मेरे घर के स्टोर रूम से....काश मैं वहां न जाती. मैं रोने लगी.
तुम्हे कभी न कभी तो हकीकत का सामना करना ही था. तुमने अपनी माँ से कुछ कहा?
मुझमें इतनी हिम्मत नही हैं कि अपनी माँ से यह सब पूछ सकूँ.
देखो ताश्री..मेरी बात सुनो....उसने कहते हुए मेरा हाथ पकड़ा. वो अचानक रुक गया. उसने मेरे सिर को छुआ.
तुम्हे तो बुखार हैं! उसें कहा.
नही...बस थोडा सा सिरदर्द हैं.
बुखार और सिरदर्द में फर्क होता हैं. चलो हॉस्पिटल चलते हैं.
नही...मैं ठीक हूँ. पहले मैं जानना चाहती हूँ कि सच क्या हैं?
मैं तुम्हे सब बता दूंगा लेकिन अभी तुम हॉस्पिटल चलो.
उसने मुझे जबरदस्ती उठाया और हॉस्पिटल ले गया. मुझे १०३° का बुखार था. उसने डॉक्टर को बताने के बाद दवाई ली और फिर हम बाहर आ गये. हम ऑटो का इंतज़ार कर ही रहे थे कि अंतस की नज़र सामने पड़ी एक जीप पर पड़ी.
ये यहाँ क्या कर रहा हैं? अंतस ने कहा.
कौन?
राणा ठाकुर!
मुझे आश्चर्य हुआ. यह राणा ठाकुर की ही जीप थी.
मुझे मिले थे वो...
कब?
परसों...मॉल के बाहर...मुझसे माफ़ी मांग रहे थे.
किसलिए?
मुझे उन लडको ने छेड़ा था इसलिए...और तुम्हे पीटा था इसलिए भी...
मुझे पीटा था इसलिए भी माफ़ी मांगी थी. उनसे हँसते हुए कहा.
हाँ..क्यों?
नही कुछ नही. इतने में ऑटो आ गया. हम ऑटो में बैठ गये. घर पहुँच कर जब में उतरने लगी तब उसने कहा.


ताश्री! मैं जानता हूँ कि तुम सच जानना चाहती हो, लेकिन सच तो तुम पहले से ही जानती हो। तुम्हे बस उसे स्वीकार करना होगा। सत्य कहना आसान हैं, सुनना मुश्किल हैं लेकिन उसे स्वीकार करना सबसे मुश्किल हैं।

------------


पिछले एक घंटे से नंदिनी और एसीपी चतुर्वेदी की मीटिंग चल रही थी. चतुर्वेदी इस थाने के विभिन्न मामलो से एसीपी को अवगत करा रहे थे. बड़े-बड़े गुनाहगार जो पुलिस के लिए सिरदर्द बन गये थे, राजनैतिक चेहरे जो खुद किन्ही गुंडों से कम न थे. किससे कैसे निपटना हैं, किसको नज़रन्दाज करना हैं...सब वो नंदिनी को विस्तार से बता रहे थे. वो भी सारी बातें ध्यान से सुन रही थी. अंत चतुर्वेदी बोले.
कल विजय किसी फाइल के बारें में पूछ रहा था.
हाँ...वो ताश्री मर्डर केस के बारे में कुछ पूछना था.
ताश्री मर्डर केस! उसमें क्या पूछना हैं? वो तो केस ही बंद हो चूका हैं.
बंद हो गया था या कर दिया गया था. नंदिनी ने चतुर्वेदी की आँखों में झांकते हुए पूछा.
आप कहना क्या चाहती हैं मैडम?
जब तक आरोपी कानून की पकड़ में न हो केस बंद नही माना जाता.
हमें कोशिश की थी...लेकिन आरोपी फरार हो चुका था.
आपने फोटो सर्कुलेट किये थे? क्योंकि जहाँ तक मुझे याद हैं इस केस से जुड़ा कोई भी फोटो मेरे थाने में तो नही आया था.
फोटो नही था...हमने स्केच बनवाया था, सर्कुलेट भी करवाया था, हो सकता हैं किसी कारणवश आपके पास न आ पाया हो.
...और अब वो स्केच कहाँ हैं और साथ में एक डायरी भी तो थी?
दोनों यही थे इस फाइल के साथ में...और नंदिनी उस डायरी को वैसे भी सबुत के तौर कैसे पेश किया जा सकता हैं? वो डायरी किसी काल्पनिक कहानी जैसी थी, एक लड़की जिसके पास ऐसी शक्ति हैं कि वो किसी को भी सम्मोहित कर सकती हैं, उसका दिमाग पढ़ सकती हैं. भई जब वो सबका दिमाग पढ़ सकती हैं तो कोई भला उसे मार ही कैसे सकता हैं? वो अपने कातिल का दिमाग क्यों नही पढ़ पायी थी?
यह तो आपको जांच करनी चाहिए थी कि कैसे, क्यों और किसने ताश्री को मारा था?
तो आपको क्या लगता हैं कि हमने किसी के दबाव में जांच रोक दी थी?
मुझे तो इस केस में दो ही बातें लगती हैं...या तो किसी को बचाने की कोशिश की जा रही थी या फिर किसी को फँसाने की कोशिश की जा रही थी.
मिस नंदिनी....सत्य अक्सर वो नही होता हैं जो कि हमें दीखता हैं. हम बस उसकी परछाई का पीछा करते रहते हैं जबकि वो ठीक हमारे पीछे खड़ा होता हैं. हमें जब लगता हैं कि हम उस तक पहुँच चुके हैं...हम उसे पीछे छोड़ आये होते हैं.
सच कही भी छुपा हो एसीपी साहब! मैं उसे ढूंढ ही निकलूंगी.
इसके बाद एसीपी चतुर्वेदी चले गये. नंदिनी को एक बात तो समझ में आ गयी थी कि यह केस वो नही था जो कि दिख रहा था इसे काफी उलझाया गया था. बहुत कुछ छुपाने की कोशिश की जा रही थी. लकिन एक बात फिर भी उसे समझ में नही आ रही थी. एक सवाल जो कि चतुर्वेदी सर ने उठाया था कि अगर ताश्री किसी का भी दिमाग पढ़ सकती थी तो कोई उसे कैसे मार सकता था? क्यों वो अंतस का दिमाग नही पढ़ पा रही थी? क्यों वो नही जानना चाहती थी कि अंतस के दिल में क्या हैं? शायद ताश्री अंतस पर विश्वास करती थी. इतना विश्वास की जो वो आसानी से जान सकती थी वो भी नही जान पा रही थी. अपने सामने खड़े सच को नही देख रही थी. ऐसा विश्वास तो सभी करते हैं. नंदिनी ने भी तो किया था... बेइन्तहा विश्वास...और वो भी नही देख पाई थी जो उसकी आँखों के सामने था....

_____________________________
avatar
smenaria
Admin

Posts : 96
Points : 218
Reputation : 0
Join date : 02.05.2012
Age : 27
Location : The Hell

View user profile http://menaria.me.cc

Back to top Go down

9. याग्निक

Post by smenaria on Fri Jun 17, 2016 12:28 pm

यह कोई पांच साल पहले की बात हैं नंदिनी आईपीएस एक्साम्स की तैयारी कर रही थी. वह दिन-रात पढाई में ही लगी हुई थी. उसका बस एक ही लक्ष्य था किसी भी तरह इन परीक्षाओ में पास होना. इसके लिए नंदिनी ने शहर की सर्वश्रेष्ठ कोचिंग क्लासेज ज्वाइन की थी. सुबह जाना, शाम को आना, फिर पढाई, रिवीजन.... यही उसकी रोज़ की दिनचर्या बन गयी थी. लकिन एक दिन यह सबकुछ बदल गया.
उस दिन नंदिनी रोज़ की तरह कोचिंग जाने के लिए ऑटो का इन्तेजार कर रही थी. हल्की-हल्की बारिश हो रही थी, जिसने माहौल को काफी ठंडा बना दिया था. कुछ देर इंतज़ार के बाद नंदिनी को एक ऑटो मिला, नंदिनी ने ऑटो रुकवाया और उसमें बैठ गयी. तभी किसी ने पीछे से ऑटोवाले को आवाज दी.
भैया कहाँ जाओगे? एक २४ साल के नौजवान ने पास आकर पूछा.
माफ़ करना भैया! सवारी मिल गयी हैं. ऑटो वाले ने कहा. आप कोई दूसरा ऑटो देखो.
आप जा कहाँ रहे हैं...सिटी हॉस्पिटल?
हाँ भैया लेकिन ऑटो बुक हो चूका हैं.
उस लड़के ने कुछ देर सोचा और नंदिनी की तरफ देखते हुए कहा, सुनिए...अगर आपको कोई तकलीफ न हो तो मैं साथ आ सकता हूँ क्या? मेरी गाडी खराब हो गयी हैं और मैं काम के लिए पहले ही लेट हो चूका हूँ. उसने पास ही मेकेनिक के यहाँ पड़ी अपनी बाइक की तरफ इशारा करते हुए कहा. यहाँ ऑटो बहुत मुश्किल से मिलते हैं और आपको भी सिटी हॉस्पिटल ही जाना हैं, किराया पूरा मैं दे दूंगा.
ठीक हैं. नंदिनी ने बस इतना ही कहा. वो लड़का ऑटो में बैठ गया और ऑटो चल पड़ा.
आप कोचिंग जा रही हैं?
हम्म... नंदिनी ने बाहर देखते हुए ही कहा.
शाह कोचिंग क्लासेज?
हां.
आप आकांक्षा को जानती हैं, मेरी कजिन हैं, वो भी वही तैयारी कर रही हैं.
नही...वहां इतने सारे स्टूडेंट्स हैं कि सबसे जान-पहचान नही हो पाती.
वैसे मेरा नाम याग्निक हैं, पास ही सिटी हॉस्पिटल में काम करता हूँ, कोई काम हो तो याद कर लीजियेगा.
शुक्रिया...नंदिनी ने कहा. नंदिनी का कोचिंग सेंटर आ गया था. नंदिनी वही उतर गयी.
दोपहर को कोचिंग ख़त्म होने पर नंदिनी ऑटो का इंतजार कर रही थी. तभी याग्निक वहाँ पहुँच गया. वो नंदिनी को देख कर मुस्कुराया.
आपके क्लास ख़त्म हो गयी. उसने नंदिनी से पूछा.
हम्म...आपके छुट्टी हो गयी?
अरे नही...लंच ब्रेक हुआ हैं...बाइक लेने जा रहा हूँ, शाम को ऑटो की दिक्कत रहती हैं न. नंदिनी कुछ नही बोली. कुछ देर चुप्पी के बाद याग्निक बोला.
ऑटो शेयर कर ले.
किराया आप ही देंगे. नंदिनी के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान तैर गयी.
हां...हां...क्यों नही.
दोनों ऑटो में बैठ गये. रास्ते में याग्निक कुछ-कुछ देर में बात करता रहता था. नंदिनी समझ रही थी कि वो उससे बात करना चाह रहा था लेकिन इसमें कुछ गलत भी नही था...आजकल हर लड़का दूसरी लड़की से बात करना चाहता हैं और लडकियाँ भी...
अगले दिन सुबह नंदिनी कोचिंग के लिए ऑटो का इंतजार कर रही थी. वो आज वैसे ही आधा घंटा लेट हो गयी थी और ऊपर से ऑटो मिल ही नही रहा था. तभी सामने बाइक पर याग्निक आकर रुका.
लिफ्ट चाहिए. उसने हेलमेट उतारते हुए कहा.
जी...नही...मैं चली जाउंगी.
आज मुझे आप लेट लग रही हैं, मेरे पास अहसान चुकाने का अच्छा मौका हैं. उसने हँसते हुए कहा.
नही....कोई बात नही...मैं चली जाउंगी.
ठीक हैं...जैसी आपकी मर्जी... याग्निक ने वापस हेलमेट लगा लिया.
रुको. नंदिनी ने इधर-उधर देखा कोई ऑटो दिख ही नही रहा था. मैं आती हूँ. और नंदिनी बाइक पर बैठ गई.

-----------
28/01/2013
तीन दिन तक मैं बिस्तर में ही पड़ी थी. वायरल हो गया था. आज थोडा ठीक हुआ हुआ हैं. परसों माँ ने NGO से छुट्टी ले ली थी. कल वैसे भी रविवार की छुट्टी थी. माँ से अब मैं बहुत ही कम बात कर रही थी, लेकिन माँ ने बुखार को इसकी वजह मान कर कुछ नही कहा. अंतस रोज़ फोन कर हालचाल पूछ लेता था, मैं अब उसके साथ थोड़ी सामान्य हो गयी थी. माँ से मेरी जो दुरी बनी थी शायद उसे अंतस भर रहा था. वो मेरे इस अकेलेपन का साथी था.
आज थोड़ी तबियत ठीक हुई तो मैं कोलेज गयी थी. माँ तो मना कर रही थी लेकिन मेरा अब घर में दम घुटता था. पूजा आज भी घुमसुम लग रही थी.
तेरी तबियत कैसी हैं? उसने पूछा.
अब थोड़ी ठीक है. मेरा गला एकदम बैठा हुआ था. मैंने एक दबी आवाज में कहा.
तुझे क्या हो गया हैं? मैंने पूछा.
नही...कुछ भी तो नही...ठीक हूँ.
इतनी उदास उदास क्यों लग रही हैं, कोई परेशानी हैं क्या?
नही कुछ नही... उसने मुझसे भी धीरे आवाज में कहा.
तू मिलने भी नही आई. मैंने अब वो बात कही जो मुझे सबसे पहले कहनी थी.
सोरी यार! वो थोडा बिजी हो गयी थी.
तो कम से कम फोन ही कर लेती.
उसने कुछ नही कहा. मुझे वो अजीब लग रही थी. लेकिन हो सकता उसको भी कोई परेशानी हो. वैसे भी मेरी ज़िन्दगी में भी कौनसी कम मुसीबते थी?
दो पीरियड बाद ही वो चली गयी. कह रही थी कोई काम हैं. हाफ ब्रेक के बाद मैं भी बाहर आ गयी. मैंने कोलेज से बाहर आकर अंतस को फोन किया.
तुम कहाँ हो? मैंने पूछा.
कहाँ आना हैं? ये कभी सवाल का जवाब नही देता. हमेशा प्रतिप्रश्न ही पूछता हैं.
मैं कोलेज के यहाँ हूँ.
ठीक हैं...तो तुम कैफे में पहुँचो में वही आ रहा हूँ.
नही...वहां नही वो कोलेज के पास ही रहता हैं..कोई पहचान वाला आ जाएगा तो दिक्कत रहेगी.
हम्म...तो स्वीट कैफ़े आ जाओ.
ठीक हैं. मैने कहा.

___________________________________________________________________

यह सिलसिला धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा. नंदिनी को याग्निक पहली नज़र में ही भा गया था. उसकी बातें नंदिनी पर जादू करती थी. नंदिनी जैसे एक नयी ही ज़िन्दगी जी रही थी. इधर नंदिनी की छुट्टी होती उधर याग्निक के लंच ब्रेक हो जाता, दोनों साथ ही खाना खाते. उनकी बातें ऐसी थी की खत्म ही न होती. नंदिनी अब दिन रात याग्निक के ही ख्वाबो में खोयी रहती थी. कुछ दिनों बाद याग्निक ने नंदिनी को मोबाइल लाकर दे दिया. अब दोनों को दिन में जब भी वक़्त मिलता फोन पर बात कर लेते, पुरे दिन एसएमएस-चैटिंग तो थी ही. नंदिनी इस सब में इतना खो गयी कि उसकी पढाई पर भी अब असर होने लगा था. महोब्बत चाहे जितना भी सुकून दे मगर पढाई का तो यह सत्यानाश ही करती हैं. महीने भर बाद ही उसके एग्जाम थे और उसका आधा कौर्स भी न हो पाया था. अब उसकी कोचिंग ख़त्म हो गयी थी और वो घर पर ही पढाई कर रही थी. अंजनी माँ को भी यह बदलाव नज़र आ रहा था, उन्होंने नंदिनी से पूछा भी था लेकिन उसने परीक्षा की टेंशन बता कर इसे टाल दिया था.

एक दिन नंदिनी शाम को अपनी परीक्षा का प्रवेश पत्र डाउनलोड करने बाज़ार में गयी थी. साइबर कैफ़े से बाहर आते वक़्त उसने बाइक पर याग्निक को जाते हुए देखा.
उसके पीछे साडी में एक लड़की बैठी थी. नंदिनी ने घर आकर याग्निक को फोन किया.
हेल्लो याग्निक... कहाँ हो?
घर पर हूँ.
तुम अभी मार्किट गए थे.
हाँ...क्यों?
नहीं ऐसे ही तुम्हे देखा था सो...तुम्हारे साथ वो लड़की कौन थी?
क्यों क्या हुआ? याग्निक ने हँसते हुए कहा.
ऐसे ही पूछ रही हूँ बताओ न?
अरे बाबा! मेरी भाभी थी.
तुम्हारे भैया कब से हो गए? तुमने कभी बताया नहीं.
तुमने कभी पूछा ही नही. अरे वो मेरे पड़ोस में रहती हैं. उसके पति बाहर रहते हैं. उन्हें कुछ सामान लाना था तो माँ ने मुझे भेज दिया था उनके साथ में. तुम भी कितना शक करती हो.
याग्निक मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, अगर कुछ भी ऐसा वैसा-हुआ तो मैं मर जाउंगी.
ऐसा कुछ नही हैं. कहो तो बात कराऊँ तुम्हारी उनसे?
नही उसकी कोई जरुरत नही हैं...मैं ऐसे ही पूछ रही थी.

एक दिन नंदिनी बैठ कर पढाई कर रही थी कि उसका फ़ोन बजा. यह याग्निक ही था.
तुम मिलने आ सकती हो?
अभी?
हाँ...अभी...
अभी क्यों?
कुछ नही आज छुट्टी थी तो सोचा कि मिल लेते हैं.
कहाँ पर आना हैं?
मरुधरा होटल.
होटल! नंदिनी चौंकी. होटल में क्यों? रोज की तरह कैफे में ही मिल लेते हैं न.
कैफ़े में अच्छे से कहाँ बात हो पाती हैं? होटल में शांति से मिल पाएंगे.
नंदिनी इस 'शांति' का मतलब अच्छी तरह से समझ रही थी.
नही याग्निक में होटल-वोटल में नही आउंगी. मिलना ही ही हैं तो कही भी मिल लेते हैं.
तुम्हे मुझ पर भरोसा नही?
नही वो तो हैं लेकिन...
तो फिर तुम मुझसे प्यार नही करती.
हां...वो भी करती हूँ.
तो फिर उस प्यार के वास्ते आ जाओ.
याग्निक ने नंदिनी को एक बड़े धर्म संकट में डाल दिया था. उसे प्यार और विश्वास के बीच में से एक को चुनना था.....और उसने प्यार को चुना. नंदिनी ने अपना सर्वस्व याग्निक को अर्पित कर दिया. अब ऐसा और कोई नही था जिस पर नंदिनी को और भरोसा हो, ऐसा कोई नहीं जिससे वो और ज्यादा प्रेम कर सके, अब उसका सब कुछ बस वो एक ही था.

एक दिन नंदिनी ने याग्निक को फोन किया.
याग्निक, मुझे तुम्हारी माँ से मिलना हैं.
ये अचानक तुम्हे क्या हो गया हैं?
कब तक हम ऐसे ही छुप-छुप कर मिलते रहेंगे. तुम अपने घरवालो से बात करो, मैं भी नंदिनी माँ को सब बता रही हूँ.
और फिर क्या? पढाई-वडाई सब छोड़ कर घर बैठ जाओगी. अपना करियर भी बनाना हैं या नही? पहले अपने एग्जाम की तैयारी करो...शादी का बाद में देखते हैं...ओके?
हम्म....ठीक हैं.

अभी तो नंदिनी मान गयी थी, लेकिन उसके मन में अजीब भय बैठ गया था. कोई लड़की बहुत कम ही किसी से प्यार करती हैं, लेकिन जब करती हैं तो वो उसपर पूरा अधिकार चाहती हैं.


-----------------------------------------
मैं वहां पहुंची तो अंतस वहां पहले से ही मौजूद था. अजीब बात हैं मुझे बस कोई आधा घंटा ही लगा होगा यहाँ आने में, लेकिन फिर भी वो मुझसे पहले आ गया था. उसने ज्यूस-कोफ़ी सब पहले से ही आर्डर कर रखा था.
तुम्हारे कोई काम-धंधा नही हैं क्या? मैंने बैठते हुए कहा.
वही तो कर रहा हूँ. वो मुस्कुराया.
ये लड़कियां पटाने का काम कौन करवाता हैं?
तुम्हे लगता हैं मैं तुम्हे पटाने की कोशिश कर रहा हूँ?
करना भी मत..मेहनत बेकार जाएगी.
वो फिर से हंस दिया. अब कैसी तबियत हैं तुम्हारी?
अब ठीक है...वैसे थैंक्स... मैंने कहा.
वो किसलिए.
वो तो तुम भी मुझे लेकर गयी थी.
हाँ सो तो हैं लेकिन.....मैं कहते कहते रुक गयी.मेरी नज़र सामने की टेबल पर पड़ी. ये तो पूजा थी और उसके साथ वो लड़का भी था वही जो उस दिन मॉल के बाहर उसके साथ बाइक पर था. हम्म....तो ये काम था मैडम का जिसके लिए यह कॉलेज छोड़कर आई थी. मैं आज इसे रंगे हाथो पकड़ना चाहती थी ताकि इसके पास झूठ बोलने का कोई बहाना न रहे. मैं उठकर उसकी टेबल के पास गयी.
हाय पूजा! वो मुझे देखकर एकदम सन्न रह गयी.
ताश्री...पूजा ने धीरे से कहा. वो लड़का भी मुझे ऐसे देख रहा था जैसे में कबाब में हड्डी बन कर आई थी. अपने दोस्त से नही मिलवाओगी मुझे. मैंने चेहरे पर झूठी मुस्कान लाते हुए कहा.
हां...वो...ये याग्निक हैं..मेरे पड़ोस में रहता हैं. पूजा ने कहा.
avatar
smenaria
Admin

Posts : 96
Points : 218
Reputation : 0
Join date : 02.05.2012
Age : 27
Location : The Hell

View user profile http://menaria.me.cc

Back to top Go down

10. धोखा

Post by smenaria on Fri Jun 17, 2016 12:30 pm

नंदिनी के एग्जाम सिर पर थे और वो पूरी जी-जान से तैयारी में जुटी हुई थी. अच्छे से अच्छे ऑथर्स की बुक, अलग अलग टीचर के नोट्स, खुद के बनाये गए नोट्स.... जो हो सके सब रेफर कर रही थी. लेकिन समय इतना कम रह गया था कि सारा कोर्स कर पाना संभव ही नही हो पा रहा था. नंदिनी याग्निक से भी कम ही बात कर रही थी. दिन में एक आध बार फ़ोन पर हाय-हेल्लो कर लेती थी. मिलना तो अब हो ही नही पाता था.

आज सुबह कोचिंग से फ़ोन आया था कि रिवीजन क्लास थी. नंदिनी भी पहुँच गयी. क्लास ख़त्म होने के बाद नंदिनी वापस आ रही थी कि रास्ते में उसने किसी को सब्जी खरीदते हुए देखा. अरे हाँ...यह तो वही भाभी थी जो उस दिन याग्निक की गाडी के पीछे बैठी थी. एक बार तो नंदिनी ने सोचा कि उन्हें इग्नोर कर दे लेकिन फिर जाने उसे क्या सूझा वो उसके पास गयी.

नमस्ते भाभी....
नमस्ते....! आप कौन? उसने चोंकते हुए कहा.
नंदिनी...मैं याग्निक की दोस्त हूँ.
नंदिनी! अरे हाँ...तुम यग्निक के साथ काम करती हो... याग्निक ने बताया था मुझे तुम्हारे बारें में...लेकिन तुमने मुझे कैसे पहचाना?
मैंने दो दिन पहले आपको याग्निक के साथ देखा था यहीं मार्केट में.
हाँ...वो मेरे लिए साडी लेने आये थे. अनिवर्सिरी गिफ्ट....कल हमारी शादी की सालगिरह हैं ना...उन्होंने तुम्हे बताया तो होगा?

क्या....अनिवर्सिरी?!! नंदिनी की आँखे फटी की फटी रह गयी.
मुझे मालुम था वो बताना भूल गए होंगे. मैंने कहा था अपने ऑफिस के सभी कलीग्स को इन्वाइट करे....कम से कम तुम्हे तो लेकर आये. बहुत तारीफ़ सुनी थी तुम्हारी.... कम से कम मिलना तो हो. ठीक हैं अब मैं चलती हूँ. कल तुम जरुर आना..मैं यग्निक से भी फोन करवा दूंगी, एक नंबर के डफर हैं वो भी....
जी...बिल्कुल...

नंदिनी जैसे सुधबुध खो बैठी थी. उसके तो पैरो तले से ज़मीन ही खिसक गयी थी. उससे चला तक नही जा रहा था, जैसे किसी ने उसके पैरो में बेड़ियाँ बाँध दी हो. उसे अपने सुने पर विश्वास ही नहीं हो रहा था...हो सकता हैं उसी ने गलत सुना हो. याग्निक कभी उसके साथ धोखा कर ही नही सकता. इतना मासुम सा शख्स भला कैसे इतनी बड़ी चाल चल सकता हैं? उस्ने घर आते ही याग्निक को फोन किया. यह लम्हा उसके बहुत ही डरावना था. वो ईश्वर से बार-बार दुआ कर रही थी कि काश उसने जो सूना जो समझा वो सब गलत हो, एक गलत फहमी हो.

हेल्लो यग्निक...
हाँ जान...कैसी हो? क्लास कैसी रही तुम्हारी?
अच्छी थी....नंदिनी ने दबी-सी आवाज में कहा.
क्या हुआ तबियत तो ठीक हैं तुम्हारी..मुझे मालुम हैं तुम खाना खाकर नही गयी होगी. मैंने कितना बार तुमसे कहा हैं...
याग्निक मुझे तुमसे कल मिलना हैं. नंदिनी फोन पर यह बात नही करना चाहती थी या शायद वो एक रात और प्यार के भ्रम में गुज़ारना चाहती थी.
कल...कल तो मुश्किल होगा.
क्यों क्या दिक्कत हैं...कल तो वैसे भी सन्डे की छुट्टी हैं.
नहीं वो घर पर कोई फंक्शन हैं. नंदिनी का शक अब यकीन में बदलने लगा था.
कैसा फंक्शन?
मम्मी-पापा की शादी की सालगिरह हैं.
नंदिनी के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान-सी आ गयी. जैसे ज्वालामुखी का लावा निकलने से पहले धरती पर एक छोटी सी दरार पड़ती हैं.
मम्मी पापा की या तुम्हारी?
क्या बकवास कर रही हो, पागल तो नही हो गयी हो? याग्निक ने चोंकते हुए पूछा.
मुझे तुम्हारी वो भाभी मिली थी आज मार्किट में...कल तुम्हारी और उसकी शादी की सालगिरह में इन्वाइट कर के गयी हैं.
वो...वो...तुम्हे कोई गलतफहमी हुई है....मैं तुमसे अभी आकर मिलता हूँ. याग्निक ने हड़बड़ाहट में कहा.
नही..कल ही मिलते हैं न.... शांति से.... होटल में....
मैं अभी आ रहा हूँ...तुम बस स्टैंड के पास वाले गार्डन में आ जाओ.


--------------------
रात की आठ बज रही थी. बरसात के बाद की सर्द हवा शरीर को ठिठुरा रही थी. उस गार्डन में इक्के दुक्के लोग ही बचे होंगे. एक बेंच पर एक साया अकेला घुमसुम सा बैठा था. निष्प्राण, निर्जीव किसी वृक्ष के समान...मानो काटो तो भी उफ़्फ़ तक न करे. जिस व्यक्ति से मिलने के लिए वो दिन रात बैचेन रहती थी आज उससे मिलने में भी उसे कोफ़्त हो रही थी. याग्निक से उसकी डोर तो टूट ही चुकी थी अब तो केवल वजह जाननी बाकि रह गयी थी. कुछ ही देर में याग्निक सामने था.

हैप्पी अनिवर्सिरी जानू.....आंसुओ से डूबे उस चेहरे ने एक झूठी मुस्कान बिखेरते हुए कहा. उसकी आँखों से आंसुओ का झरना बह रह था. वो टूट चुकी थी और केवल वाष्प बन कर उड़ जाना चाहती थी. नंदिनी देखो तुम्हे कोई ग़लतफ़हमी हुई हैं...वो दरअसल.... याग्निक ने सफाई देनी चाही.

बस....याग्निक बस....नंदिनी ने थर्राती आवाज में कहा. मुझे सिर्फ एक सवाल का जवाब दो...क्या वो औरत तुम्हारी पत्नी हैं?

याग्निक कुछ पल रुका. हाँ....उसने एक लंबी निश्वास लेते हुए कहा. लेकिन....

तो फिर तुमने मेरे साथ यह खिलवाड़ क्यों किया? क्यों तुमने मेरे प्यार का मज़ाक बनाया?
मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी नंदिनी...प्लीज मेरी बीवी को इसके बारें में कुछ मत बताना.

नंदिनी जैसे सन्न रह गयी. याग्निक को अब भी केवल अपनी बीवी की परवाह थी.

तुमने कभी मुझसे प्यार किया भी था याग्निक...? नंदिनी ने आखिरी सवाल पूछा.
हाँ...प्यार तो करता हूँ लेकिन....

बस जैसे नंदिनी को अपने सारे सवालो के जवाब मिल गए थे. यह 'लेकिन' बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द हैं. यह भावनाओ के मायने बदल देता हैं. अगर वाक्य के पहले लग जाए तो किसी भी परिस्थिति में रिश्ते को ताउम्र निभाने की शक्ति दे देता हैं. वही अंत में लगे रिश्ते के ख़त्म होने का संकेत दे देता हैं. इसके बाद यग्निक ने हज़ारो दलीले दी लेकिन सब किसी बहाने जैसी थी. जिस रिश्ते की नींव ही खोखली हो उस पर चाहे जितना सीमेंट पत्थर लगा दिया जाए वो दिवार नहीं टिकती.


इस घटना ने नंदिनी को पूरा तोड़ कर रख दिया था. दो दिन तक तो वो सिर्फ रोती रही थी. उसके बाद बीमार ही हो गयी थी. एग्जाम देने भी नही जा सकी थी. अंजनी माँ ने जब नंदिनी को पूछा तो उसने सबकुछ बता दिया. उन्हें भी यह जान कर गहरा सदमा लगा था. विश्वास टूटने पर कैसा लगता हैं वो अपने अनुभव से खूब जानती थी. लेकिन वो भी नंदिनी को ढाढस बंधाने के अलावा और कुछ न कर सकी.

खैर...उसके बाद ज़िन्दगी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी.नंदिनी अब पहले से कई गुना मज़बूत हो चुकी थी. जैसे लोहा आग में तपने के बाद और भी कठोर हो जाता हैं. उसके स्वाभाव में भी गंभीरता आ चुकी थी. इस बार उसने जी-जान से परीक्षाओ की तैयारी की और पहली ही बार में साक्षात्कार के लिए चयनित हो गयी.

-----------------
मेम! वो हवलदार रामनायक पर फायरिंग हुई हैं. कहते हुए विजय ने केबिन में प्रवेश किया.नंदिनी जैसे किसी नींद से जागी थी. उसकी आँखे आंसुओ से भीगी हुई थी.

कम से कम नोक करके तो आया करो.
नंदिनी ने उल्टा घूम कर अपने आंसू पौंछते हुए कहा.

सॉरी मेम वो अर्जेंट था इसलिए ...
फायरिंग कहाँ पर हुई हैं?
वो टोल नाके पर गश्ती पर गया था. कोई ट्रक वाला ठोक कर चला गया.
अब कहाँ हैं वो?
सिटी हॉस्पिटल में एडमिट करवाया हैं.


--------------------------------------------------------

ये मेरी दोस्त ताश्री हैं याग्निक. पूजा ने कहा.
अच्छा तो तुम ताश्री हो, बड़ी तारीफ़ सुनी हैं तुम्हारी. उस लड़के ने चेहरे पर झूठी मुस्कान लाते हुए कहा.
हाँ...लेकिन मैंने तुम्हारे बारें में कभी नहीं सुना. मैंने पूजा को घूरते हुए कहा.
वो.... ताश्री..... मैं तुम्हे बताने ही वाली थी....
चलो कोई बात नही एन्जॉय करो.

मैं वापस अपनी टेबल पर आ गयी.
चलो अंतस चलते हैं यहाँ से.
क्यों क्या हुआ?
कुछ नही यहाँ घुटन सी हो रही हैं.
हाँ वायरल का असर होगा. इतनी जल्दी ठीक भी नही होता.

वायरल का नही यह विश्वास टूटने का असर था. मेरी माँ के बाद पूजा दूसरी इंसान थी जिस पर मैंने सबसे ज्यादा विश्वास किया था...मेरी सबसे अच्छी दोस्त! मेरी माँ की तो मैं आँखे नहीं पढ़ सकती थी, लेकिन पूजा को तो मैंने खुद चुना था. मैंने कभी उसका दिमाग नही पढ़ा था क्योंकि मैं किसी पर विश्वास करना चाहती थी...और किसी के बारें में सबकुछ जानने बाद यह संभव न था.

लेकिन मैं गलत थी....दुबारा. मेरी माँ की तरह पूजा ने भी मुझसे झूठ बोला था. साफ...मेरे मुंह पर....यह बात मैं अब तक समझ नही पा रही थी कि आखिर यह बात पूजा ने मुझसे क्यों छुपाई थी?
avatar
smenaria
Admin

Posts : 96
Points : 218
Reputation : 0
Join date : 02.05.2012
Age : 27
Location : The Hell

View user profile http://menaria.me.cc

Back to top Go down

11. बदला

Post by smenaria on Fri Jun 17, 2016 12:35 pm

अब तो मेरी यह हालत हो गयी हैं कि न तो घर में रुकते बनता हैं और न ही कॉलेज जाते बनता हैं. घर में मैं माँ से बात नही करना चाहती थी और कॉलेज में पूजा से चिढ हो रही थी. मगर फिर मैंने आज घर रहना ही बेहतर समझा. माँ आज सुबह जल्दी ही एनजीओ चली गयी थी, मेरे उठने से भी पहले...वैसे मैं उठी भी तो 9.00 बजे थी.

मुझे अंतस के फोन ने उठाया था.

कॉलेज जाओगी?
क्यों? मैंने पूछा.

नहीं ऐसे ही पूछ रहा था.

...ताकि तुम बाहर चाय वाले के याहं खड़े रह कर तांका-झांकी कर सको. मैंने चुटकी लेते हुए कहा.

हाहा...मुझे अब उसकी जरुरत नही हैं. मुझे जो चाहिए था वो मिल चूका हैं.

ओये मिस्टर...ऐसे किसी भरम में मत रहना...तुम्हे कुछ भी मिला-विला नहीं हैं.

तुम्हे ऐसा लगता हैं क्योंकि शायद तुम्हे पता नहीं हैं कि मुझे क्या चाहिए.

मुझे जानना भी नही हैं...

तबियत तो ठीक हैं तुम्हारी?

हाँ अब बेहतर हैं..

उसके फोन रखने के बाद मैंने चाय-नाश्ता किया और नहा कर ध्यान करने बैठ गयी. आज थोडा दिमाग सही लग रहा था.

मैं आसन लगाकर पद्मासन मैं बैठ गयी. मैंने अपनी आँखे बंद कर ली और सिर्फ अपनी साँसों का आना जाना महसूस कर रही थी. मैंने अपना पूरा ध्यान अपनी दोनों आँखों की भोंहो के बीच केन्द्रित कर दिया. कुछ देर बाद में मुझे वहां एक लाल प्रकाश दिखा जो कि सफेद हो गया.

मैं एक रेगिस्तान में थी. लेकिन यह बिलकुल गर्म नही था, आसमान में काले बादल छाए हुए थे. चारो तरफ रेत ही रेत फैली हुई थी. कुछ ही दूर एक पानी की झील थी. जिसके किनारे पर एक सफ़ेद घोडा खड़ा था. यह वहीँ घोडा था मगर आज इसके पंख भी थे. मैं उसके पास गयी और उसे सहलाया. वो एक बार हिनहिनाया और फिर दूर जाकर खड़ा हो गया. पता नही इसकी मुझसे क्या दुश्मनी हैं, मैं जब भी इसके पास जाती हूँ यह मुझसे दूर चला जाता हैं. मैं फिर से इसके पास गयी, मैंने अपने एक हाथ की हथेली उसके सर की ओर कर दी और अपनी नज़रे झुका ली. मैंने सुना था कि घोड़े आँखों में देखने पर वो बिदक जाते हैं. मैं धीरे से अपना हाथ इसके पास ले गयी और इसके सिर पर रख दिया. इस बार यह शांत खड़ा था. मैं इसे प्यार से सहलाने लगी.

मुझे तुम पर विश्वास हैं. मैंने धीरे से इसके कानो में कहा.

वो फिर से हिनहिनाया.

तुम्हे मुझसे डरने की जरुरत नही हैं. तुम भी मुझ पर विश्वास कर सकते हो. इस बार उसने अपने पंख जोर से फद्फदाये और नीचे बैठ गया. यह बिलकुल अजीब बात हैं घोड़े कभी जमीन पर नहीं बैठते. मैं कुछ देर उसे देखती रही और फिर उसके ऊपर बैठ गयी, वो कुछ दूर भागा और फिर हवा मैं उड़ गया.

यह आजतक का मेरा सबसे शानदार मुझे अनुभव था. मैं अपने सपनो की दुनियां की उड़ान भर रही थी. मुझे डर तो लग रहा मगर यह रोमांचक भी था. पहले हम इस रेगिस्तान के उपर से गुजरे जिसके किनारे पर एक समुद्र था जिसके दुसरे छोर पर था एक जंगल जो की एक पहाड़ के करीब ख़त्म हो रहा था...इस पहाड के दूसरी और बर्फ जमी थी. आगे पूरी एक बर्फ के पहाड़ो की श्रंखला थी. उस घोड़े ने मुझे एक पहाड़ पर लाकर उतार दिया. यहाँ चारो और बर्फ ही बर्फ थी मगर ठण्ड नही थी. मुझे नीचे उतार कर वो घोडा उड गया. मैने देखा कि उसने मुझे जहां उतरा हैं उसके ठीक सामने एक गुफा थी. आखिर यह घोडा मुझे यहाँ इतनी दूर क्यों लाया? जरुर यहाँ कुछ न कुछ हैं जो वो मुझे दिखाना चाहता हैं. मैं उस गुफा में घुसने ही वाली थी तभी आसमान एक बिजली कड़की. मगर इसके गरजने की आवाज थोड़ी अलग थी. मै ध्यान से ऊपर देखने लगी. वहां एक और बिजली कडकी मगर इस बार आवाज और भी अलग थी यह किसी घंटी जैसी बिलकुल पतली आवाज थी...फिर दो तीन बार और घंटी बजी. तभी मेरे पास आकर एक बीजली गिरी....बिलकूल अँधेरा हुआ और मेरी आँखे खुल गयी.

मैं ध्यान से बाहर आ गयी थी. कोई लगातार डोरबेल बजाये जा रहा था. मैं सामान्य हुई और मैंने दरवाजा खोला. यह पूजा थी.

क्या कर रही थी? इतनी देर क्यूँ लगा दी गेट गेट खोलने में... उसने अन्दर घुसते हुए पूछा.

कुछ नही...वो हेडफ़ोन लगा रखे थे. मैंने झूठ बोलते हुए कहा.

ओह! मुझे लगा सो रही थी.

तू कोलेज नही गयी? मैंने कहा.

गई थी, लेकिन तू नही थी तो वापस आ गयी. वो अब तक अन्दर आकर बैठ चुकी थी.

मैं तो पहले भी दो-तीन दिन कोलेज नही आई थी. मैंने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा.

तो तू मुझसे अबतक नाराज हैं.

...और क्या पता...आज भी अपने बॉयफ्रेंड से मिलने के लिए ही छुट्टी मार ली हो. इस बार मैंने थोडा सा गुस्से में ही कहा.

वो मेरा बॉयफ्रेंड नही हैं.

इस तरह छुप-छुपकर अकेले कैफे में बॉयफ्रेंड के साथ ही जाते हैं.

तो वो जो तुम्हारे साथ था वो तुम्हारा बॉयफ्रेंड था. उसने इस बार फिर से तीर मेरी और घुमा दिया.

कम से कम तुम उसके बारें में जानती तो हो...मैंने तुम्हारे मुंह पर झूठ तो नही बोला. मैं तैश में आ गयी थी. वो चुप हो गयी और सर झुकाकर बैठ गयी.

मैं कुछ शांत हुई और फिर बोली.

हम्म...तो तुम्हे मुझ पर विश्वास नही हैं. मेरी सबसे अच्छी दोस्त को ही मुझ पर विश्वास नही हैं. पता हैं जब तुम बीमार होने का बहाना बनाकर घर जाती थी, तब मुझे हमेशा पता होता था कि तुम झूठ बोल रही हो...मगर क्यों बोल रही हो यह मुझे कभी समझ में नही आया. मैं उस लड़के के बारे में ज्यादा तो नही जानती पूजा मगर एक बात मैं उसे देखकर ही बता सकती हूँ कि वो लड़का तुम्हारे लायक नही हैं.

मैं जानती हूँ ताश्री...वो एक नंबर का कमीना हैं.

मतलब?

तुम जानकार भी क्या करोगी? तुम दिमाग पढ़ सकती हो मगर अतीत नही बदल सकती.

क्या हुआ? बताओ तो सही.

वो लड़का मुझे ब्लैकमेल कर रहा हैं.

तुमने ऐसा क्या किया था जो वो तुम्हे ब्लैकमेल कर रहा हैं.

तुम्हे अंकित तो याद होगा?

हाँ...वो लड़का जो तुम्हारे पीछे पड़ा था.

हां वो ही...मुझे भी उससे प्यार हो गया था.

अंकित से!!? मैंने आँखे फाड़ कर पूछा.

...और मैं प्रेग्नेंट हो गयी थी. ये मेरे लिए असली झटका था. मेरा सर चकरा गया.

तुम प्रेग्नेंट हो?

नही, अब नही हूँ.

मतलब तुमने एबॉर्शन करवाया था.

हम्म...

कब?

तुम्हे याद हैं मैंने महीने भर पहले दो तीन दिन की छुट्टियां ली थी कॉलेज से....

तो तुमने अपने घरवालों को क्या बोला?

दोस्त की शादी में जा रही हूँ.

...और तुम्हारे घरवाले मान गए?

हां...क्योंकि मैंने कहा था कि तुम्हारे साथ जा रही हूँ.

मैंने अपना सिर पिट लिया. लेकिन इससब का उस लड़के से क्या कनेक्शन हैं.

वो मेरे पड़ोस में रहता हैं और सीटी हॉस्पिटल में काम करता हैं. मैं वही एबॉर्शन करवाने के लिए गई थी. मुझे क्या पता था वो इतना कमीना निकलेगा. उसने मेरी सोनोग्राफी की रिपोर्ट देख ली थी. उसने उनकी कोपी देख ली थी और उसके बाद मुझे ब्लैकमेल करने लगा.

वो तुझसे क्या चाहता हैं?

लड़के लड़कियों से क्या चाहते हैं?

कमीना कहीं का... मेरे मुंह से निकला.

कल उसने मुझे होटल में मिलने के लिए बुलाया हैं.

...और तू जाएगी?

मेरे पास और रास्ता ही क्या हैं?

तू अपने घरवालो को क्यों नही बता देती?

उससे तो अच्छा हैं कि मैं आत्महत्या ही कर लूँ.

पागल हैं क्या? अंकित ने क्या कहा?

वो मेरा एबॉर्शन करवाने के बाद दिल्ली चला गया.

और तु यहाँ इस चक्कर में फंस गयी.

वो रोने लगी. काश! वो मनहूस दिन मेरी ज़िन्दगी में आया ही नही होता. जिस दिन मैं उस हॉस्पिटल गयी थी.

मैं सोचने लगी थी. मुझे अपनी दोस्त के लिए अफ़सोस हो रहा था. तभी अचानक मेरे दिमाग में कुछ आया.

और अगर सचमुच वो दिन तुम्हारी ज़िन्दगी से निकल जाए तो?

क्या? पूजा ने चौंकते हुए पूछा.

तुमने कहा था न कि मैं अतीत नही बदल सकती....शायद तुम गलत हो.

हम दोनों तय समय पर होटल के नीचे पहुँच गये. मैंने पूजा को वहीँ रुकने को कहा.

तुम्हे कितना समय लगेगा. पूजा ने पूछा.

यहीं कोई लगभग आधा घंटा.

ताश्री! मुझे तो डर लग रहा हैं. अगर तुम यह नहीं करना चाहती तो रहने दे. मैं नहीं चाहती हूँ की मेरी वजह से तू किसी मुसीबत में पड़ जाए.

मेरी तू एक ही तो दोस्त हैं. अगर मैं तेरे ही काम नही आ सकती तो फिर मेरी इस शक्ति का मतलब ही क्या हैं? ये याग्निक आज के बाद कभी तुझे परेशां नही कर पायेगा ये मेरा तुझसे वादा हैं. तू मुझपर भरोसा रख कोई दिक्कत नही होगी. मैंने चेक किया वो पेन अब भी मेरी जेब में ही था.

अगर तू आधे घंटे के अन्दर नही आई तो मैं ऊपर आ जाउंगी.

ठीक हैं.

मैं होटल में चली गई. याग्निक के कमरे के बाहर जाकर मैंने डोरबेल बजाई. मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था, धड़कन दुगुनी रफ़्तार से चल रही थी. रोहित का मामला अलग था, वहां अगर मैं यादाश्त न भी मिटा पाती तब भी में उसे नियंत्रित कर ही सकती थी मगर यहाँ मामला दूसरा था.

कुछ देर बाद उसने दरवाजा खोला.

ताश्री...तुम! तुम यहाँ क्या कर रही हो? उसने चौंकते हुए पूछा.

अन्दर नही बुलाओगे मुझे? मैंने एक झूठी मुस्कान बिखेरते हुए कहा.

हाँ...हां...आओ न? वो सकपका गया था.

तुम आखिर पूजा से चाहते क्या हो? मैंने बेड पर बैठते हुए कहा.

वो...वो..उसने तुम्हे क्या बताया?

यहीं की वो आज नही आएगी.

मगर क्यों?

उसे कोई जरुरी काम आ गया था.

ऐसा कैसे हो सकता हैं? वो जानती हैं न आज उसका मुझसे मिलना कितना जरुरी हैं.

हां...बेशक...तभी तो उसने मुझे भेजा हैं. ज़रा मुझे देखकर बताओ...क्या मैं उससे कम खुबसूरत हूँ.

न...नही....तुम भी खुबसूरत हो...

तो ज़रा मेरी आँखों में झांककर बताओ क्या ये किसी झील से कम गहरी हैं. मैंने अपना चश्मा उतार दिया.

हम्म...बिलकुल नही....

मैं जिस दिन से तुमसे मिली हूँ तबसे तुमसे कुछ कहाँ चाहती हूँ याग्निक! मैंने उसके पास आते हुए कहा.

क्या?

भाड़ में जाओ!!

मेरी आँखों के सामने एक रौशनी चमकी और में उसके दिमाग में थी. नीचे हरा-भरा घांस का भरा एक मैदान... ऊपर बिजलियों से चमकता हुआ एक आसमान जिसमें बादल गरज रहे थे. पास ही एक नदी थी जिसमे उसकी यादो के प्रतिबिम्ब दिख रहे थे. यह नदी पास ही एक पहाड़ से आ रही थी.

मैंने एक सीटी बजाई और कुछ ही देर में एक नीला घोडा मेरे सामने हाज़िर था. यह याग्निक का अंतर्मन था. मुझे देखकर एक बार तो वो जोर से हिनहिनाया. जैसे किसी अजनबी की घुसपैठ से परेशान हो. मैं उसके पास गयी और उसकी गर्दन पर हाथ फिराया.

शांत रहो...मैं तुम्हारी दोस्त हूँ. मुझे वहां ऊपर जाना हैं. मैंने पहाड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा.

उसने एक बार मुझे देखा और फिर वो नीचे बैठ गया. अब मैं उसके ऊपर सवार थी और वो आसमान में उड़ रहा था. कुछ ही देर में हम उस पहाड़ पर थे. वहां चारो और टीवी स्क्रीन लगी हुई थी जिसपर उसकी यादे परिलक्षित हो रही थी. मैंने अपनी जेब से वो पेन निकाला और उसे घुर कर देखा, वो एक तलवार जितना बड़ा हो गया. अब मैं उन स्क्रीन्स के पास गयी और उन्हें एक-एक करके तोड़ने लगी.

यह देखकर वो घोडा जोर से हिनहिनाया.

चुपचाप वही खड़े रहो. मैंने उसे डपटते हुए कहा और वापस वो स्क्रीन्स तोड़ने लगी. यह उन यादो को मिटाने का एक तरीका था, इससे भले ही यादें पूरी तरह से न मिटे पर वो किसी काम की भी नही रहती थी. मैं पूरी मग्न होकर यह काम करने लगी तभी मुझे कुछ आवाज आई... मैंने पीछे मुड़ कर देखा, वो घोडा गायब हो चूका था और उसकी जगह एक जंगली कुत्ता खड़ा था.

अरे नही! अब यह एक दिक्कत थी. यह कुता वास्तव में अन्तर्मन का रक्षक था. मैं वहाँ से भागी. कुछ देर भागने के बाद में रुक गयी. मैं वापस उसी जगह आ गई थी. मैं पीछे मुड़ी और मैंने एक पत्थर उठा लिया. वो कुता रुक गया और वापस भाग गया जैसे वो डर गया हो. मैंने चैन की सांस ली और सामने मुड़ी. अब डरने की बारी मेरी थी. सामने वही तांत्रिक था. काला चोगा पहले, गले में रुद्राक्ष की माला और हाथ में एक त्रिशूल लिए हुए.

मेरे लिए यह वास्तव में डरने की बात थी. क्योंकि सपने में उस तांत्रिक का आना दूसरी बात थी और यहाँ अंतर्मन में आना एक दूसरी बात...मुझे अब समझ में आया था कि मैं जैसे-जैसे याग्निक के अंतर्मन की गहराइयों में उतरी थी, खुद के भी अंतर्मन की गहराई में उतरती गई थी और शायद इसी वजह से मेरा इस तांत्रिक से सामना हुआ हैं.

मैं भागने के लिए वापस पीछे मुड़ी मगर पीछे भी वो ही खड़ा था.

तुम ग्यारहवां सूत्र हो- तुम ग्यारहवां सूत्र हो. वो बार-बार यहीं बोल रहा था. मेरे चारो तरफ वो ही तांत्रिक था जैसे उसने एक घेरा बना लिया हो... और वो मेरे पास आने लगा.

मेरे पास मत आओ. मैंने उसे धमकाते हुए कहा मगर मेरी धमकी बेअसर थी. वो धीरे-धीरे मेरी और बढ़ रहा था.

तुम ग्यारहवां सूत्र हो. वो किसी मंत्र की तरह इस लाइन का जाप कर रहा था.

मैं ताश्री हूँ...ताश्री. मैं जोर से चिल्लाई. मैंने आसमान की तरफ देखा. बिजलियाँ और जोर से कडकने लगी और नीचे जमीं पर गिरने लगी. वहां हर तरफ बिजलियाँ गिर रही थी...वो सारी स्क्रीन्स उन बिजलियों से एक एक कर जलने लगी और तभी एक बिजली मेरे ऊपर आकर गिरी.

------------------------------------------------------------

मेरी आँख खुली तो मैं एक होटल के कमरे में थी. मेरा सर बहुत ही जोर से दर्द कर रहा था जैसे किसी ने इस पर तेजाब डाल दिया हो. मैंने ध्यान से देखा यह कमरा याग्निक का तो नही लग रहा था.

थैंक गॉड! तुम्हे होश आ गया. पूजा ने कहा. वो मेरे पास ही बैठी थी. उसके पास ही अंतस भी खड़ा था. अरे हाँ! यह तो अंतस का कमरा था. मैं थोड़ी सी उठी और अपने सर पर हाथ लगाया. उस पर कुछ लगा हुआ था किसी लेप के जैसा.

मैं यहाँ कैसे आ गयी?

हम दोनों लेकर आये हैं. तुम बेहोश हो गयी थी. अंतस ने कहा.

बेहोश!...मगर में बेहोश कैसे हो गयी?

वो तो तुम ही बता सकती हो. मैं कमरे पहुंची तब तक तो तुम और याग्निक दोनों बेहोश पड़े थे. पूजा ने कहा.

और तुम वहां कैसे पहुंचे? मैंने अंतस से पूछा.

मेरे कमरे में पहुँचने तक तुम दोनों बेहोश थे और तुम्हारे फोन पर अंतस का फोन आ रहा था मैंने फोन उठाया और इसे वहीँ बुला लिया. पूजा ने ही जवाब दिया.

और माँ....!

मैंने उन्हें फोन करके बोल दिया हैं आज तुम मेरे घर पर ही रुकोगी तुम्हे अपना बाकि का होमवोर्क करना हैं.

मगर हम तुम्हारे घर पर तो नही हैं.

इसके घर ले जाने और तुम्हारे घर ले जाने में ज्यादा फर्क नही हैं. दोनों जगह तुम्हे बहुत सारे जवाब देने पड़ते जो शायद् तुम देना नही चाहती.

मैं कुछ देर चुपचाप बैठी रही और स्थिति का आकलन करने लगी. मगर मुझे सरदर्द के आगे कुछ समझ ही नही आ रहा था.

ये मेरे सर पर क्या लगा रखा हैं.

चन्दन हैं....यह तुम्हारी कुण्डलिनी उर्जा को नियंत्रित करने में मदद करेगा. अंतस ने कहा.

मतलब?

मतलब यह कि तुम्हे जो हुआ था वो दरअसल कुण्डलिनी उर्जा का आधिक्य प्रवाह था जो तुमने अपने बाकि चक्रों से आग्नेय में खींच ली थी...इससे तुम्हारी उर्जा का संतुलन बिगड़ गया और तुम बेहोश हो गयी.

मगर मैं तो उसके दिमाग में थी?

यही तो समस्या थी...इसीलिए तुम अपनी उर्जा को नियंत्रित नही कर पायी. तुम उसके दिमाग को नियंत्रित जरुर कर रही ही मगर वास्तव में तुम दोनों के दिमाग आपस में जुड़े हुए थे.

मुझे अंतस की जानकारी पर आश्चर्य हो रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे उसने इस विषय पर पी.एच.डी. कर रखी हो. पूजा तो बस हम दोनों को आँखे फाड़ कर देख ही रही थी जैसे हम दोनों किसी दूसरी दुनिया की भाषा में बात कर रहे हो.

मुझे तो उस लड़के याग्निक की फिकर हो रही हैं. अगर तुम्हे छह घंटे लगे हैं होश आने में तो उसका क्या हाल हुआ होगा. अंतस ने कहा.

क्या मैं...छह घंटे से बेहोश थी...
avatar
smenaria
Admin

Posts : 96
Points : 218
Reputation : 0
Join date : 02.05.2012
Age : 27
Location : The Hell

View user profile http://menaria.me.cc

Back to top Go down

कुण्डलिनी योगा

Post by smenaria on Fri Jun 17, 2016 12:38 pm

कुंडलिनी योग – खतरनाक हो सकता है

योग के बारे में अगर आप थोड़ी-बहुत भी दिलचस्पी रखते होंगे तो कुंडलिनी योग के बारे में जरूर सुना होगा, संभव है कहीं से कुछ पढ़ा या सीखा भी हो, लेकिन सावधान, यह जितना लाभदायक है उतना ही खतरनाक भी। क्यों? आइये जानते हैं –

अगर आप कुंडलिनी को जाग्रत करना चाहते हैं तो आपको अपने शरीर, मन और भावना के स्तर पर जरूरी तैयारी करनी होगी, क्योंकि अगर आप बहुत ज्यादा वोल्ट की सप्लाई एक ऐसे सिस्टम में कर दें जो उसके लिए तैयार नहीं है तो सब कुछ जल जाएगा।


आजकल बहुत सारी किताबें और योग-स्टूडियो या योग केंद्र कुंडलिनी योग और उसके लाभों के बारे में बात करते हैं। यह बात और है कि वे इसके बारे में जानते कुछ भी नहीं। यहां तक कि जब हम कुंडलिनी शब्द का उच्चारण भी करते हैं तो पहले अपने मन में एक तरह की श्रद्धा लाते हैं और तब उस शब्द का उच्चारण करते हैं, क्योंकि यह शब्द है ही इतना विशाल, इतना विस्तृत। अगर आप कुंडलिनी को जाग्रत करना चाहते हैं तो आपको अपने शरीर, मन और भावना के स्तर पर जरूरी तैयारी करनी होगी, क्योंकि अगर आप बहुत ज्यादा वोल्ट की सप्लाई एक ऐसे सिस्टम में कर दें जो उसके लिए तैयार नहीं है तो सब कुछ जल जाएगा। मेरे पास तमाम ऐसे लोग आए हैं जो अपनी शारीरिक क्षमताएं और दिमागी संतुलन खो बैठे हैं। इन लोगों ने बिना जरूरी तैयारी और मार्गदर्शन के ही कुंडलिनी योग करने की कोशिश की। अगर कुंडलिनी योग के लिए उपयुक्त माहौल नहीं है, तो कुंडलिनी जाग्रत करने की कोशिश बेहद खतरनाक और गैरजिम्मेदाराना हो सकती है।

अगर आप इस ऊर्जा को हासिल करना चाहते हैं, जो कि एक जबर्दस्त शक्ति है, तो आपको स्थिर होना होगा। यह नाभिकीय ऊर्जा (न्यूक्लियर एनर्जी) के इस्तेमाल की तकनीक सीखने जैसा है। जापान की स्थिति को देखते हुए आजकल हर कोई परमाणु विज्ञान पर बहुत ध्यान दे रहा है, और उस के बारे में बहुत ज्यादा सीख रहा है। अगर आप रूसी अनुभव को भूल चुके हैं, तो जापानी आपको याद दिला रहे हैं। अगर आप इस ऊर्जा को हासिल करना चाहते हैं तो यह काम आपको बड़ी ही सावधानी से करना होगा। अगर आप सुनामी और भूकंप जैसी संभावनाओं से घिरे हैं, फिर भी आप न्यूक्लियर एनर्जी से खेल रहे हैं तो आप एक तरह से अपने लिए मुसीबत को ही निमंत्रण दे रहे हैं। कुंडलिनी के साथ भी ऐसा ही है।

आज ज्यादातर लोग जिस तरह की जिंदगी जी रहे हैं, उसमें बहुत सारी चीजें, जैसे- भोजन, रिश्ते और तरह-तरह की गतिविधियां पूरी तरह से उनके नियंत्रण में नहीं हैं। उन्होंने कहीं किसी किताब में पढ़ लिया और कुंडलिनी जाग्रत करने की कोशिश करने लगे। इस तरह कुंडलिनी जाग्रत करना ठीक ऐसा है जैसे आप इंटरनेट पर पढक़र अपने घर में न्यूक्लियर रिएक्टर बना रहे हों। न्यूक्लियर बम कैसे बनाया जाता है, वर्ष 2006 तक इसकी पूरी जानकारी इंटरनेट पर मौजूद थी। हमें नहीं पता कितने लोगों ने उसे डाउनलोड किया। बस सौभाग्य की बात यह रही कि इस बम को बनाने के लिए जिस पदार्थ की जरूरत होती है, वह लोगों की पहुंच से बाहर था। कुंडलिनी के साथ भी ऐसा ही है। बहुत सारे लोगों ने पढ़ लिया है कि कैसे कुंडलिनी जाग्रत करके आप चमत्कारिक काम कर सकते हैं। हो सकता है कि बुद्धि के स्तर पर उन्हें पता हो कि क्या करना है, लेकिन अनुभव के स्तर पर उन्हें कुछ नहीं पता। यह अच्छी बात है, क्योंकि अगर वे इस ऊर्जा को हासिल कर लेते हैं, तो वे इसे संभाल नहीं पाएंगे। यह उनके पूरे सिस्टम को पल भर में नष्ट कर देगी। न केवल उनका, बल्कि आसपास के लोगों का भी इससे जबर्दस्त नुकसान होगा।

कहीं किसी किताब में पढ़ कर कुंडलिनी जाग्रत करना ठीक ऐसा है जैसे आप इंटरनेट पर पढक़र अपने घर में न्यूक्लियर रिएक्टर बना रहे हों।
इसका मतलब यह नहीं है कि कुंडलिनी योग के साथ कुछ गड़बड़ है। यह एक शानदार प्रक्रिया है लेकिन इसे सही ढंग से किया जाना चाहिए, क्योंकि ऊर्जा में अपना कोई विवेक नहीं होता। आप इससे अपना जीवन बना भी सकते हैं और मिटा भी सकते हैं। बिजली हमारे जीवन के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन अगर आप उसे छूने की कोशिश करेंगे, तो आपको पता है कि क्या होगा। इसीलिए मैं आपको बता रहा हूं कि ऊर्जा में अपनी कोई सूझबूझ नहीं होती। आप जैसे इसका इस्तेमाल करेंगे, यह वैसी ही है। कुंडलिनी भी ऐसे ही है। आप इसका उपयोग अभी भी कर रहे हैं, लेकिन बहुत ही कम। अगर आप इसे बढ़ा दें तो आप अस्तित्व की सीमाओं से भी परे जा सकते हैं। सभी योग एक तरह से उसी ओर ले जाते हैं, लेकिन कुंडलिनी योग खासतौर से उधर ही ले जाता है। दरअसल पूरा जीवन ही उसी दिशा में जा रहा है। लोग जीवन को जिस तरह से अनुभव कर रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा तीव्रता और गहराई से अनुभव करना चाहते हैं। कोई गाना चाहता है, कोई नाचना चाहता है, कोई शराब पीना चाहता है, कोई प्रार्थना करना चाहता है। वे लोग ये सब क्यों कर रहे हैं? वे जीवन को ज्यादा तीव्रता के साथ महसूस करना चाहते हैं। हर कोई असल में अपनी कुंडलिनी को जाग्रत करना चाहता है, लेकिन सभी इस काम को उटपटांग तरीके से कर रहे हैं। जब आप इसे सही ढंग से, सही मागदर्शन में, वैज्ञानिक तरीके से करते हैं तो हम इसे योग कहते हैं


Read this also- 7 chkra of our body


Last edited by smenaria on Fri Jun 17, 2016 1:52 pm; edited 2 times in total
avatar
smenaria
Admin

Posts : 96
Points : 218
Reputation : 0
Join date : 02.05.2012
Age : 27
Location : The Hell

View user profile http://menaria.me.cc

Back to top Go down

क्या नंदिनी ताश्री की डायरी पढ़ चुकी हैं?

Post by smenaria on Fri Jun 17, 2016 1:44 pm

Quote:
Originally Posted by Ng93
Ooo Teri. .....ye to kamal hogya...
Waise diary aur present m nandini sath sath chal rahe h ...iska mtlb nandini diary padh rahi h kya ? Agar nandini diary padh rahi hoti to usko idea hojata ki yagnik k sath aisa kyu hua ...
Dairy k according, Takshri pooja ki help krne s pehle experiment k Taur pr Rohit ko thappad marne ko bolti h aur khud Rohit k dimag s uski yaddash gayab krdeti h kch seconds ki ...
Aur shyaad same usne Yagnik k sath kia hoga bt 1 month ki jagah uske life k kafi saal hi gayab krdiye Takshri n...ab aisa kyu hoga ye to diary m aage pata chalega...
Nandini ab dono s milne ja rahi h .. usko khushi hogi is baat ki yagnik sb kch bhul chuka h jo usne nandini ya kisi aur ladki k sath kia hoga....
क्या नंदिनी ताश्री की डायरी पढ़ चुकी हैं?

इस कहानी को पढ़ते हुए एक बड़ा सवाल जो मन में आता हैं वो यह हैं कि क्या नंदिनी ताश्री की पूरी डायरी पहले ही पढ़ चुकी हैं या फिर वो साथ-साथ पढ़ती जा रही हैं? वास्तव में यह सवाल दो कहानीयां एक साथ चलने के कारण(स्टोरी स्वैपिंग) उठता हैं, जैसे कि क्या नंदिनी जानती हैं कि याग्निक के साथ क्या हुआ था?

कहानी का यह स्टोरी स्वैपिंग फीचर 'arrow series' से प्रेरित हैं जिसमें हीरो(ओलिवर क्वीन) पांच साल एक निर्जन टापू पर रह कर लौटता हैं और शो में उसकी वर्तमान ज़िन्दगी और पांच साल पहले उस टापू पर उसकी ज़िन्दगी को एक साथ बताया गया हैं, लेकिन क्योंकि उस शो में पुरानी बातें खुद ओलिवर क्वीन के साथ घटित हुई हैं इसलिए इस तरह का सवाल नही उठता...और हम जानते हैं कि बस दर्शको को उसकी पुरानी ज़िन्दगी थोडा थोडा भाग बताया जा रहा हैं वरना वो तो सब जानता ही हैं।

इस कहानी में यह मानना की नंदिनी ने पूरी डायरी नही पढ़ी हैं एक तरह की बेवकूफी होगी। लेकिन अगर नंदिनी पूरी डायरी पढ़ ले तो यह मेरे(लेखक) के लिए एक दिक्कत होगी... इसलिये मैंने चैप्टर  "अनुत्तरित" में लिखा हैं-

Quote:
एसीपी नंदिनी ने विजय को आवाज लगायी.
जी मैडम कहिये.
मुझे ये ताश्री केस की फाइल चाहिए.
मैडम आप क्यों गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हो? ये केस कब का बंद हो चूका हैं.
क्या आरोपी जेल में हैं?
नही लेकिन...
तो फिर मुझे फाइल लाकर दो.
जी मैडम.
कुछ ही देर में फाइल नंदिनी के टेबल पर थी. एक डायरी भी थी इसके साथ में...मेरे पास तो फोटोकॉपी हैं. नंदिनी ने फाइल उलटते हुए कहा.
यानी की नंदिनी के पास ओरिजिनल डायरी नही हैं! बस फोटोकॉपी हैं। इसलिए वो पूरी डायरी नही पढ़ सकती हैं। हाँ लेकिन यह माना जा सकता हैं कि उसके पास जितनी डायरी हैं वो उतनी डायरी पढ़ चुकी हैं ,आगे नंदिनी को ताश्री की असली डायरी भी मिलेगी और वहां तक नंदिनी डायरी पहले ही पढ़ चुकी हैं। इसलिए नंदिनी जानती हैं कि याग्निक के साथ क्या हुआ हैं... :-)

Keep Loving...

__________________
avatar
smenaria
Admin

Posts : 96
Points : 218
Reputation : 0
Join date : 02.05.2012
Age : 27
Location : The Hell

View user profile http://menaria.me.cc

Back to top Go down

कहानी संक्षिप्त में...

Post by smenaria on Fri Jun 17, 2016 1:59 pm

“ताश्री...Don’t Look into her eyes” में अब तक आपने पढ़ा कि यह कहानी उन्नीस वर्षीय कॉलेज जाने वाली एक आम लड़की ताश्री की डायरी के बारे में हैं. ताश्री किसी की आँखों में देख कर उसका दिमाग पढ़ सकती है और उसे नियंत्रित भी कर सकती हैं. ताश्री को एक तांत्रिक के डरावने सपने आते हैं, जिसमें तांत्रिक उसको “ग्यारहवां सूत्र” कह कर पुकारता हैं.

एक दिन कोलेज जाते वक्त कोलेज के बाहर उसे एक लड़का(अंतस) दीखता हैं. कोलेज से आते वक्त कुछ लड़के उसे की छेड़ते हैं, तभी वो लड़का आकर उनकी पिटाई करता हैं. शाम को वो ताश्री से फेसबुक पर बात करता हैं जिससे ताश्री को पता चलता हैं कि वो काफी समय से उसका पीछा कर रहा हैं. अंतस बार-बार उसको मिलने के लिए कहता हैं लेकिन ताश्री टालती रहती हैं, लेकिन काफी जिद करने पर उससे मिलने चली जाती हैं. मिलने पर अंतस बताता हैं कि ताश्री के पिता मरे नहीं हैं वो जिन्दा हैं और अंतस उनके बारें में जानता हैं मगर ताश्री उसकी बातों पर विश्वास नही करती हैं. तभी ताश्री को छेड़ने वाले लड़के वहां आ जाते हैं और अंतस को पीटने लगते हैं, तब ताश्री को पता चलता हैं कि वो शहर के बहुत बड़े उद्योगपति राणा के भतीजे हैं. राणा ताश्री को देखकर अंतस को छोड़ देता हैं और अपने भतीजे की हरकत के लिये ताश्री से माफ़ी मांगता हैं. ताश्री अंतस को हॉस्पिटल लेकर जाती है जिसके बाद दोनों दोस्त बन जाते हैं. अगले दिन ताश्री को कोलेज में एक लड़के(रोहित) का ख़त मिलता हैं, जिसमे वो अपने प्यार का इज़हार करता हैं, ताश्री क्लास में जाकर सबके सामने उसे खरी-खरी सुनाती हैं. बाद में रोहित ताश्री से कहता हैं कि वो घमंडी लड़की हैं और वो तो क्या कोई भी लड़का उससे प्यार नही कर सकता हैं.

ताश्री को ध्यान(meditation) करते वक़्त जागृत स्वप्न(Lucid Dreams) आते हैं, जिसमें वो अपने सपनो को नियंत्रित कर सकती हैं और अपने मन की गहराइयों में झांक सकती हैं. ताश्री वहां एक सफ़ेद घोड़े को देखती हैं जोकि उसके अंतर्मन का प्रतिक हैं.


एसीपी नंदिनी का अभी ही शहर में ट्रान्सफर हुआ हैं. उन्हें अपने ड्रावर में कुछ पेपर में मिले हैं जो कि ताश्री की डायरी हैं. कहानी में नंदिनी ही यह डायरी पढ़ रही हैं. इंस्पेक्टर विजय नंदिनी को बताता हैं कि दो साल पहले(सन २०१३ में) ताश्री का मर्डर हो गया था और उसके मर्डर का आरोपी उसका बॉयफ्रेंड अंतस अभी फरार हैं. नंदिनी को झटका लगता हैं क्योंकि डायरी पढ़ते-पढ़ते उसे ताश्री से लगाव हो गया था. नंदिनी किसी केस के सिलसिले में महेंद्र प्रताप से मिलना होता हैं. इस मुलाकात में प्रताप और नंदिनी के बीच तकरार हो जाती हैं लेकिन तभी प्रताप के बड़े भाई राणा ठाकुर आकर मामले को संभाल लेते हैं. नंदिनी राणा के व्यवहार से प्रभावित होती हैं. विजय उसे बताता हैं कि ताश्री के मर्डर केस में राणा का भी नाम आया था. नंदिनी अनाथाश्रम में ही पली-बढ़ी हैं, जयपुर आने के बाद वो वापस अनाथाश्रम में अपने दोस्तों से मिलने जाती हैं मगर यह जानकार दुखी हो जाती हैं कि वहां कि वार्डन अंजनी माँ अब वहां काम नही करती हैं. नंदिनी ताश्री मर्डर केस के सिलसिले में एसीपी चतुर्वेदी से भी मिलती हैं जिन्होंने इस केस की तहकीकात की थी, लेकिन वो भी अंतस को ही आरोपी मानते हुए कोई भी ख़ास जानकारी देने से मना कर देते हैं. नंदिनी एसीपी चतुर्वेदी की बातें सुनकर अपनी पुरानी यादों में खो जाती हैं, नंदिनी को याग्निक नाम के एक लड़के से प्यार हुआ था...मगर वास्तव में याग्निक ने नंदिनी के साथ धोखा किया था क्योंकि वह पहले से ही शादीशुदा था. तभी विजय आकर नंदिनी को बताता हैं कि उनके हवलदार पर किसी ट्रक ड्राईवर ने फायरिंग कर दी हैं.

ताश्री को अपने घर के स्टोर रूम से एक तस्वीर मिलती हैं जिसमें उसकी माँ शादी के जोड़े में किसी और आदमी के साथ होती हैं, उसे देखकर ताश्री वो अंतस की बातो पर विश्वास हो जाता हैं कि हो सकता हैं उसकी माँ झूठ बोल रही हो और वो जिसे अपना पिता समझ रही हैं वो उसका पिता हैं ही नही! ताश्री अपनी दोस्त पूजा को किसी लड़के के साथ देखती हैं, पूजा को इस बारें में पूछने पर वो मना कर देती हैं और बात को टाल देती हैं मगर फिर रेस्टोरेंट में वो पूजा को एक लड़के के साथ देख लेती हैं और पूछने पर वो लड़का अपना नाम याग्निक बताता हैं.....
avatar
smenaria
Admin

Posts : 96
Points : 218
Reputation : 0
Join date : 02.05.2012
Age : 27
Location : The Hell

View user profile http://menaria.me.cc

Back to top Go down

12. बेसब्री

Post by smenaria on Fri Jul 08, 2016 12:14 pm

नंदिनी और विजय याग्निक के घर के बाहर पहुंचे. नंदिनी का दिल जोरो से धड़क रहा था मगर वो निश्चिन्त थी, आखिर इस दिन के लिए ही तो उसने सालों से इंतज़ार किया था. विजय ने दरवाजा खटखटाया. एक औरत ने दरवाजा खोला. नंदिनी पहचान गई, यह याग्निक की पत्नी वैदिक थी पर शायद वो नंदिनी को नही पहचान पाई थी.
इंस्पेक्टर विजय आप! सब ठीक तो हैं न? याग्निक की बीवी ने उन्हें देखकर कहा.
विजय- ये एसीपी साहिबा हैं. ताश्री के केस में कुछ पूछताछ करना चाहती हैं.
वैदिका- उसके खुनी के बारे में कुछ पता चला क्या?
नंदिनी- नहीं लेकिन जल्द ही चल जाएगा. आप ताश्री के बारें में क्या जानती हैं?
वैदिक- ताश्री के मर्डर के पहले मैने कभी ताश्री का नाम भी नही सुना था. मैं पूजा को जरुर जानती थी, वो मेरे पड़ोस में रहती थी.
नंदिनी- पूजा का आपके घर आना-जाना होता था?
वेदिका- नही...एक दो बार मिली जरुर थी लेकिन घर पर कभी नही आई थी.
नंदिनी- आपके पति कहाँ हैं?
वेदिका- वो अन्दर कमरें में ही हैं... आप मिल लीजिये तब तक में चाय बना लाती हूँ.
मैं इससे अकेले में बात करना चाहती हूँ. नंदिनी ने विजय से कहा. विजय ने हां में गर्दन हिला दी.
अन्दर एक कमरें में याग्निक फर्श पर बैठा हुआ था. ढीले-ढाले कपडे, अस्त-व्यस्त बाल, खुद से बाते करते हुए किसी बच्चे की तरह खेल रहा था.
याग्निक! नंदिनी ने याग्निक को धीरे से पुकारा. एक अनजाने खौफ ने अब भी नंदिनी की आवाज को दबा रखा था. याग्निक ने एक बार नंदिनी की और देखा.
वैदिका बाहर हैं, उसने कहा और वापस खेलने लग गया.
याग्निक! मैं नंदिनी हूँ. नंदिनी ने उसके पास बैठते हुए कहा.
वैदिका! नंदिनी आई हैं. याग्निक ने वेदिका को जोर से आवाज लगाई. उसने नंदिनी की तरफ देखा तक नही,
नंदिनी को अब गुस्सा आने लगा था, तुम मुझे ऐसे नही भूल सकते याग्निक. तुमने मेरी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी और अब तुम मुझे पहचान तक नही रहे हो.
याग्निक- चलो हम घर-घर खेलते हैं. ये मेरी वेदिका, ये मैं और ये तूम...लेकिन तुम हमारे घर में नही रहोगी. तुम बाहर खेलोगी. तुम गन्दी हो, वैदिका अच्छी हैं.
नंदिनी- बकवास बंद करो, तुमने न जाने कितनी लडकियों की ज़िन्दगीयां उजाड़ी हैं, मैं तुम्हे कभी माफ़ नही करुँगी...
याग्निक ने कुछ नंदिनी की ओर देखा वो चुप हो गयी. वो कुछ देर नंदिनी की ओर देखता रहा और फिर बोला ‘धप्प!’ और वो हंसने लगा, उल्लू बनाया...नंदिनी को उल्लू बनाया.
नंदिनी गुस्से में थी. वो और भी कुछ कहना चाहती थी मगर उसने कुछ नही कहा. वो समझ चुकी थी कि अब इसका कोई फायदा नही हैं, याग्निक सच में अपनी सोचने समझने की शक्ति खो चूका था.
नंदिनी बाहर आ गई. उसने लाख कोशिश की लेकिन अपने आंसुओ को पलकों तक पहुँचने से न रोक पाई. विजय ने उसे आँखे पौंछते हुए देख ही लिया. तब तक वैदिका भी चाय लेकर आ गई.
वैदिका- तुम नंदिनी हो. मैं सोच ही रही थी, मैंने तुम्हे कहाँ देखा हैं? उस दिन के बाद हमारी मुलाकात ही नही हुई.
नंदिनी- हां..मैं वो ट्रेनिंग के लिए शहर से बाहर चली गयी थी.
वैदिका- लेकिन तुम तो याग्निक के साथ हॉस्पिटल में काम करती थी न?
नंदिनी- वैदिका, आपके पति की यह हालत कैसे हुई?
वेदिका- पता नही..एक दिन होटल के कमरे में बेहोश मिले थे. डॉक्टर ने बताया कि कोई बड़ा सदमा लगने की वजह से इनकी यादाश्त चली गई.
नंदिनी- ...और आपने कभी सोचा नहीं वो वहां होटल में क्या कर रहे थे?
वैदिका चौंक गयी- वो होटल में...?
नंदिनी- विजय तुमने इन्हें कभी नही बताया की हम ताश्री के मामले में याग्निक से क्यों पूछताछ कर रहे हैं?
विजय- मैडम वो...हमने इन्हें बताया था ताश्री की डायरी में याग्निक का भी था.
नंदिनी- ...और किस तरह का जिक्र हैं यह?
विजय- यही की वो ताश्री का दोस्त था. विजय ने नंदिनी की आँखों में आँखे डालकर कहा, जैसे वो नंदिनी से अब रुक जाने के लिए कह रहा हो.
नंदिनी के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई. मुझे आपके पति के लिए अफ़सोस हैं, मैं दुआ करुंगी की वो जल्द से जल्द ठीक हो जाए.
विजय और नंदिनी दोनों बाहर आ गए.
विजय- आप याग्निक को जानती थी?
नंदिनी- हां, वो मेरा पुराना दोस्त हैं.
विजय- और ताश्री को?
नंदिनी- नही. मैंने पहले कभी उसके बारे में नहीं सुना. तुमने पूजा का घर कौनसा वाला बताया था?
विजय- वो इस गली में आखिरी वाला..मगर अब वो यहाँ नही रहती हैं.

नंदिनी- तो?
विजय- उसकी शादी हो गयी हैं, वो अब अपने ससुराल हैं.


-ताश्री! मुझे अब चलना चाहिए. पूजा ने कहा.
-चलना चाहिए का क्या मतलब! तुम यहाँ नही रुकोगी?
-नहीं, मैंने तुम्हारे घर पर झूठ बोला था, अपने घर पर नही. मुझे जाना होगा.
-...और मैं यहाँ इसके साथ अकेली रहूंगी?
-मुझे लगा यह तुम्हारा बॉयफ्रेंड हैं. उसने बेतल्खी से कहा. मैंने गुस्से से पूजा को घुरा.
तभी अन्तस बोला- वैसे तुम्हे मेरे साथ रहने की जरुरत नही हैं. मैंने इसी होटल में दूसरा कमरा ले लिया हैं. तुम यहाँ आराम से रह सकती हो.
पूजा उसके बाद अपने घर चली गई. मुझे अजीब लग रहा था, मैंने जिसके लिए यह आफत मौल ली थी वो ही मुझे इस मुसीबत में अकेला छोड़ कर चली गयी थी.
-लगता हैं तुम्हारी दोस्त हमारे बारे में नही जानती हैं. पूजा के जाने के बाद अंतस ने कहा.
-मैं खुद कौनसा जानती हूँ जो वो जानेगी.
-वो मुस्कुरा दिया. मेरे हर सवाल पर वो मुस्कुरा देता था, जैसे उसकी मुस्कराहट उसके सारे रहस्यों लगी ताला हो, जिसे में चाह कर भी नही खोल सकती थी.
-मुझे भूख लगी हैं. मैंने कहा.
-मैंने खाना आर्डर कर दिया हैं. आता ही होगा.
-..और यह सरदर्द कब तक रहेगा?
-कुछ घंटे, कुछ दिन, कुछ महीने या फिर कुछ साल!
-साल का क्या मतलब? मुझे ज़िन्दगी भर ऐसा सरदर्द रहेगा?
-उड़ने से पहले गिरने के बारें में पता कर लेना चाहिए. अगर पेड़ की जड़ो के साथ खिलवाड़ करोगी तो पूरा पेड़ ही हिल जाएगा. वैसे अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ.
-वो कैसे?
-जिस तरह से पानी ऊपर चढ़ता हैं वह नीचे भी उतर सकता हैं, नियमित ध्यान से यह उर्जा वापस अपने स्त्रोत तक पहुँच जाएगी, मैं तुम्हारी इसमें मदद कर सकता हूँ.
तभी खाना आ गया. खाना खाकर वो अपने कमरे में सोने चला गया.
मैंने सोने की कोशिश की लेकिन मुझे नींद नही आ रही थी. दिन को छह घंटे सोने के बाद भला नींद आती भी तो कैसे? मैंने कुछ देर टीवी देखी लेकिन टीवी पर भी होमशॉप 18 और हनुमान कवच के अलावा कुछ आ नही रहा था. पुरे दिन बकवास सीरियल दिखाने वाले चैनल रात को धर्म की दुकाने बन जाते हैं. वैसे भी मुझे सिरदर्द की वजह से कुछ देखने की इच्छा ही नही हो रही थी.
अचानक मैंने सोचा की क्यों न अंतस के रूम की तलाशी ली जाए आखिर पता तो चले की ये हैं क्या?


-----------------------------------


मैं कमरे में इधर-उधर ढूंढने लगी. उसके कमरे में बहुत सी अजीब चीजे थी, जैसे अलग अलग तरह की आयुर्वेदिक दवाइयाँ, बहुत सारी किताबे जो आध्यात्म, ध्यान और मनोविज्ञान से जुडी हुई थी. कुछ ऐसी चीजे जिनका कोई तुक ही नही था जैसे कि मोर पंख, सफेद पत्थर कुछ् जानवरो के दांत...पता नही क्या क्या सामान था इसके पास? मैंने पहली बार किसी के पास ऐसा सामान देखा था.

तभी मुझे एक ड्रावर में गले में पहनने की माला मिली, बड़े-बड़े मोतियों की उस माला के में सोने का एक त्रिशूल था, जो की हूबहू वैसा ही था जैसा की मझे स्टोर रूम में मिले उस बक्से के ऊपर था. उस माला के नीचे एक लिफाफा पड़ा था. मैंने उस लिफाफे को उठा कर खोला तो उसके अंदर एक फ़ोटो थी, एक छोटी बच्ची की, यह तो मेरी ही तस्वीर थी.

भला* मेरी बचपन की फोटो इसके पास क्या कर रही हैं और यह त्रिशूल का निशान, यह अंतस के पास कैसे आया? क्या अंतस मेरी माँ को जानता हैं, क्या उसने सच कहा था की वो मुझे तबसे जानता हैं जबसे मैं पैदा हुई हूँ. लेकिन अगर वो मुझे जानता हैं तो मैं उसे क्यों नही जानती?

नींद तो मुझे वैसे भी नही आ रही थी और जो आने वाली थी वो भी उड़ गयी. मैं अब इस आदमी पर और भरोसा नही कर सकती, मुझे इसकी हकीकत जाननी ही होगी. मैं सुबह चार बजे सोई और जब उठी तब तक नो बज चुकी थी. अंतस ने दरवाजा खटखटाया. मैं उठ कर बैठ गई मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था. मैंने अपना चश्मा पहन और दरवाजा खोला.

शुक्र हैं तुम उठ गई, वरना मुझे तो लगा था आज भी तुम्हारा पुरे दिन सोने का इरादा हैं. वो कहते-कहते अंदर आ गया. मैं खामोश खड़ी थी.

तुम्हारा सरदर्द अब कैसा हैं?
ठीक हैं।* मैंने धीरे से कहा.
चलो जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं तुम्हे घर छोड़ आता हूँ. उसने कुछ अस्तव्यस्त पड़े सामान को व्यवस्थित करते हुए कहा.
अंतस! मैंने वही खड़े हुए कहा. उसने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा.
तुम कौन हो? मैं बेड के पास आ गयी, जहाँ वो खड़ा था.
मतलब?
मैंने बेड के ड्रावर से वो माला और वो तस्वीर निकाल कर उसके सामने रख दी.
जिज्ञासा एक बहुत ही बुरी चीज हैं अगर इसे नियंत्रण में न रखा जाये . उसने वो माला उठा कर हाथ में ले ली.
मगर अज्ञानता से तो बेहतर ही हैं. मैं एक हाथ अपनें चश्में की तरफ ले गयी.* मुझे सब बताओ अंतस! वरना फिर मुझे दूसरा तरीका अपनाना होगा.
वो हंसा. अगर तुम यह करना चाहती तो तुम पहले ही कर चुकी होती.*
वो सच कह रहा था. हर चीज के* कुछ फायदे होते हैं तो कुछ नुकसान भी होते हैं. सबकुछ जानना एक श्राप हैं, क्योंकि किसी के बारें में सबकुछ जानने के बाद हम उससे प्यार नही कर सकते. यहीं वजह थी कि सच* जानने की इतनी तड़प होने के बावजूद* मैं आजतक अंतस की आँखों में नही देख पाई थी.**
मगर अब तुम मुझे मजबूर कर रहे हो. मैंने कहा.
वह चुपचाप खड़ा रहा जैसे कोई निर्णय ले रहा हो.
मैं उसके जवाब के इंतज़ार में थी.
मैं एक तांत्रिक हूँ.* उसने माला लेकर गले में पहनते हुए कहा.

तुम मज़ाक कर रहे हो. मैंने आस्चर्य से उसकी और देखा.
क्यों तुम्हे क्या लगा कि सिर्फ बड़ी दाढ़ी वाले और काला चोगा पहनने वाले ही तांत्रिक हो सकते हैं?
मेरा दिमाग घूमने लगा. कुछ कुछ अब साफ़ होने लगा था. वो सपनो का आना, फिर अंतस का मुझसे मिलना...शायद वो सपने चेतावनी थे कि मुझे अंतस से दूर रहना चाहिए...और मैं पागल उस पर ही विश्वास करने लगी थी.

--------------------------------------------

क्या मैं अंदर आ सकता हूँ मैडम? राणा ने पूछा. कुछ फाइलो को देखती नंदिनी अचानक चोंक गयी.
नंदिनी- अरे राणा साहब आप? आइये बैठिये. आज इधर का रास्ता कैसे भटक गए.?
राणा- बस इधर से गुज़र रहा था तो सोचा कि बस मिलता चलूँ आपसे.
नंदिनी- चलिए अच्छा किया. वैसे भी मैं आपसे बात करने ही वाली थी.
राणा- किस सिलसिले में?*
नंदिनी- आपको अपने पर्लटॉप होटल पर भी ध्यान देना चहिये.
राणा- क्यों? वहां क्या ख़ास हैं?
नंदिनी- आपके लिकर का लाइसेंस ख़त्म हो चूका हैं...
राणा ने नंदिनी को सवालिया नज़र से देखा.

नंदिनी- पिछली बार भी आपने लेट रिन्यू करवाया था. डिपार्टमेंट ताक में बैठा हैं. आगे फिर आपकी जिम्मेदारी होगी.
राणा- हा हा हा...शुक्रिया. अच्छा हुआ आपने बता दिया वरना ज्यादातर पुलिस वाले तो छापा मारने के बाद ही बताते हैं.
नंदिनी- मेरा मानना हैं कि जब तक जरूरत न हो ताकत का प्रयोग नही करना चाहिए...

नंदिनी बात करते करते अचानक रुक गयी. उसकी नज़र राणा के गले में पड़ी एक माला पर पड़ी जिसमें एक त्रिशूल लटका था.

राणा ने नंदिनी की नज़रो को भांप लिया.
राणा- क्या हुआ?
नंदिनी- यह माला?
राणा- आपको पसंद आई? मैं आपके लिए भी एक भिजवा दूंगा.
नंदिनी- नही..उसकी जरूरत नही हैं. यह अपने कहीं से खरीदी थी?
राणा- नही मेरे पिता ने दी थी मेरे को? क्यों कोई ख़ास बात हैं?
नंदिनी- आप ताश्री को जानते थे?
कौन ताश्री? राणा ने सीधे होते हुए कहा.
वही लड़की जिसका दो साल पहले मर्डर हो गया था.
राणा- अरे हां..याद आया. विजय उस वक्त मेरे पास पूछताछ करने के लिए आया था. कह रहा था उस लड़की की डायरी में मेरा नाम भी हैं. अब भला इतने बड़े आदमी के बारे में अख़बार वाले कुछ का कुछ छाप देते हैं. कोई लड़की अपनी डायरी में कुछ लिख दे तो मैं क्या कर सकता हूँ?
नंदिनी- उस लड़की के कातिल के पास भी ऐसी ही माला थी जैसी की आपके गले मैं हैं.
राणा- मिस नंदिनी! यह बस एक त्रिशूल हैं. दुनिया में लाखो* शिवभक्त हैं* और उनमें से कई ऐसी रुद्राक्ष की माला पहनते हैं. कल को अगर मैं ऐसी ही माला आपको भेंट कर दूँ तो क्या आप भी इस केस में शामिल हो जाएगी?
नंदिनी- मगर ताश्री ने मेरे बारें में अपनी डायरी में नही लिखा हैं.
राणा- पता नही आप भी कौनसे गढ़े मुर्दे उखाड़ने बैठ गई हैं? आपके पास आज के केस कम हैं जो आप यह दो साल पुराना केस लेकर बैठी हैं. वैसे आपके हवलदार की तबियत कैसी हैं?
नंदिनी- आपको इस बारें में कैसे पता?
राणा- अगर आप मेरी मदद कर सकती हैं तो आपकी मदद करना मेरा भी फ़र्ज़ बनता हैं.
नंदिनी- मदद... कैसी मदद?
राणा- आपके हवलदार पर फायरिंग करने वाले ड्राईवर अभी एमजी रोड पर शाह ढाबे पर खाना खा रहे हैं.
क्या? नंदिनी चोंक गयी.
राणा जाने के लिए उठ खड़ा हुआ. अब आज्ञा चाहूँगा मैडम!
avatar
smenaria
Admin

Posts : 96
Points : 218
Reputation : 0
Join date : 02.05.2012
Age : 27
Location : The Hell

View user profile http://menaria.me.cc

Back to top Go down

Re: ताश्री...Don't Look into her eyes!

Post by Sponsored content


Sponsored content


Back to top Go down

Page 2 of 3 Previous  1, 2, 3  Next

View previous topic View next topic Back to top

- Similar topics

 
Permissions in this forum:
You cannot reply to topics in this forum