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ताश्री...Don't Look into her eyes!

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13.जख्म

Post by smenaria on Fri Jul 08, 2016 12:21 pm

राणा के जाते ही नंदिनी ने विजय को आवाज लगाई.*
विजय- जी मैडम.
नंदिनी-* रामनायक पर हमला करने वालो के बारें में पता चल गया हैं. वो अभी एमजी रोड पर एक ढाबे पर हैं.
विजय- आपको राणा ने बताया?
नंदिनी- हाँ...क्यों?
विजय- कुछ नहीं...मैं जीप निकालता हूँ.*

नंदिनी और विजय कुछ देर बाद ढाबे पर थी.
विजय जीप से उतरे हुए एक ट्रक की तरफ देखता हैं. 4091...मैडम यही ट्रक हैं.
नंदिनी- मतलब की खबर पक्की हैं.
दोनों ढाबे के काउंटर पर पहुँचते हैं.
नंदिनी(ट्रक की तरफ इशारा करते हुए)- उस ट्रक का ड्राईवर कहाँ हैं?
उस आदमी ने खाट पर बैठ कर शराब पी रहे दो आदमियों की तरफ इशारा किया. वो दोनों नंदिनी और विजय को देखते ही भागे. नंदिनी और विजय भी उन दोनों के पीछे भागे.
कुछ दूर जाकर एक को तो विजय ने पकड़ लिया, दूसरे के पीछे नंदिनी थी. थोडा सा आगे जाकर उस आदमी ने पिस्तौल निकली और नंदिनी पर गोली चला दी. गोली नंदिनी के कंधे को छुकर निकल गयी. इतने में पीछे से विजय ने भी गोली चला दी, गोली उस आदमी के पैर में लगी थी. वो वहीँ नीचे गिर गया. विजय पास में आ गया.
विजय- आप ठीक तो हैं मैडम?
नंदिनी ने दूसरे हाथ से अपने ज़ख्म को दबा लिया. हां ठीक हूँ. निशाना चूक गया.
विजय उस ड्राईवर के पास गया और खींच कर दो थपड लगाये. हरामखोर पुलिस वाले गोली चलाता हैं. विजय ने तीन-चार लात-घूंसे और लगा दिया.
नंदिनी- बस विजय....इन्हें जीप में बिठाओ.
विजय उन दोनों को हथकड़ी डाली और जीप में पीछे बिठा दिया.

विजय- हिम्मत तो देखो कमीनो की. पुलिस वालो पर हमला करते हैं. बेटा तू तो लंबा अंदर जाएगा. विजय ने जीप में बैठते हुए कहा. मैडम में आगे हॉस्पिटल पर रोक देता हूँ.

नंदिनी- नही उसकी जरुरत नही हैं. ज़ख्म ज्यादा नही हैं. पहले इनको थाने पहँचते हैं फिर मैं हॉस्पिटल दिखा दूंगी.
थाने जाने के बाद वो दोनों हॉस्पिटल पहुंचे. पट्टी करवाकर दोनों बाहर आये.
विजय- मैडम मैं आपको घर छोड़ देता हूँ.
नंदिनी- कोई बात नही...मैं चली जाउंगी.
विजय- ऐसे में ड्राइव करना मुश्किल होगा. मैं छोड़ दूंगा.
ओके. नंदिनी ने कुछ सोचकर कहा. रास्ते में काफी देर दोनों खामोश रहे.
आज आप खाने का क्या करेगी. ऐसे में खाना बनाना तो पॉसिबल नही होगा. विजय ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा.
नंदिनी- हां मैं देखती हूँ कुछ...बाहर से मंगवा लुंगी.
विजय- अगर आप चाहे तो शाम को हम दोनों बाहर डिनर पर चल सकते हैं. विजय ने नंदिनी की तरफ देखते हुए कहा.
नंदिनी- नही...नही..कोई बात नही...मैं मैनेज कर लुंगी.
विजय- जी...मैडम...विजय वापस सामने देखने लगा. शायद उसे इतने सख्त जवाब की उम्मीद न थी. कुछ देर के लिए दोनों वापस खामोश हो गए.
एनीवे थैंक्स विजय. कुछ देर बाद नंदिनी बोली.
विजय- किसलिए मैडम?
नंदिनी- मेरी जान बचाने के लिए...तुम अगर ठीक समय पर फायर न करते तो दूसरी गोली मेरे भेजे में होती. शायद बिना टीम के जाना मेरी गलती थी.
विजय- नही मैडम...अगर हम इंतज़ार करते तो हो सकता था की वो हमारे हाथ से निकल जाते.

इतने में नंदिनी का घर आ गया. नंदिनी जीप से उतर कर आगे गयी और वापस मुड़ी. विजय उसे ही देख रहा था. नंदिनी को मुड़ते देख उसने नज़रे झुका ली.
आठ बजे. नंदिनी ने पास आकर कहा.
विजय- जी मैडम?
नंदिनी- डिनर...हम आठ बजे चलेंगे.*
विजय- जी मैडम बिलकुल.
नंदिनी- ...और तुम मुझे नंदिनी बुला सकते हो....यह मैडम बिलकुल अजीब लगता हैं.
विजय- जी मैडम...आई मीन नंदिनी.

नंदिनी मुस्कुरा दी. विजय के चेहरे पर भी मुस्कान आ गयी.**

------------------------------

मैं वही बैड पर ही बैठ गयी. मुझे समझ में नही आ रहा था कि यह हो क्या रहा हैं.
-मुझे घर जाना हैं. मैंने कहा.
-हां...मैं तुम्हे छोड़ देता हूँ.
-नहीं मैं चली जाउंगी. मैंने अपना बैग उठाया और घर आ गयी. घर पहुंची तब तक माँ एनजीओ जाने की तैयारी कर रही थी.
-आ गयी तू! इतनी थकी-थकी क्यों लग रही हैं? माँ ने मुझे घूरते हुए कहा.
-वो रात को काफी लेट तक पढ़ाई कर रही थी.
-तो आज कॉलेज नहीं जाएगी?
-आज वैसे भी छुट्टी हैं.
-हम्म...मैंने खाना बना के रख दिया हैं तुम खा लेना.
उसके बाद माँ निकल गयी. मुझे अब भी काफी जोर से सिरदर्द हो रहा था. मैं नहाने चली गयी. नहाकर निकली ही थी की दरवाजे की घंटी बजी. मैंने फटाफट चेंज किया और दरवाजा खोला. यह पूजा थी.
-अब तबियत कैसी हैं तुम्हारी? पूजा ने पूछा.
-अब ठीक हैं मगर यह सरदर्द ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा हैं.
-कब आई थी वहां से? पूजा ने सोफे पर बैठते हुए कहा.
-अभी आधे घंटे पहले. मैं भी सामने ही बैठ गयी.
-कुछ हुआ था क्या? उसने धीरे से पूछा.
-क्या बकवास कर रही हैं. मैं उस लड़के को जानती तक नही हूँ.
-जानना क्या हैं? हैंडसम हैं, स्मार्ट हैं और पैसे वाला भी लगता हैं.
मैं अब गुस्से में आ गई थी.* -तेरे को इतना ही पसन्द हैं तो तू ही करले तेरा तो वैसे भी....मैं कहते कहते रुक गई. पूजा रुआंसी हो गयी थी. -सॉरी....मैंने कहा.
-कोई बात नही...बट थैंक्स यार... तूने मेरे लिए जो किया हैं उसका एहसान मैं ज़िन्दगी भर नही चूका सकती.
-ऐसी कोई बात नही हैं. तु मेरी दोस्त हैं. अगर तू पहले ही बता देती तो अच्छा होता.
-मैं डर गयी थी यार. मुझे लगा जाने तू मेरे बारे में क्या सोचेगी?
-तु मेरी सबसे अच्छी दोस्त हैं और रहेगी. भले ही तु प्रेग्नेंट ही क्यों न हो जाए. मैंने हँसते हुए कहा. वो भी हंसने लगी. वैसे उस लड़के का क्या हुआ? मैंने पूछा.
-कल शाम को ही उसे घर लाए थे. लोग कह रहे थे उसकी यादाश्त चली गयी हैं. शायद पागल ही हो गया हैं.
- क्या? यह मैंने क्या कर दिया?
- कोई बात नही ताश्री. अच्छा ही हुआ. ऐसे लोगो के साथ तो ऐसा ही होना चाहिए. पता नही उसने और कितनी लड़कियो की ज़िन्दगी बर्बाद की होगी.
मैं सोचने लगी. मुझे अफसोस ही हो रहा था.
-चल ठीक हैं..मैं चलती हूँ मुझे मार्किट भी जाना हैं. पूजा ने उठते हुए कहा.
पूजा के जाने के बाद मैंने खाना खाया और सो गयी. कुछ देर बाद मुझे झटका सा लगा. जैसे किसी ने मुझे बिजली का शोक दिया हो. मेरी नींद खुल गयी. यह माँ थी मेरे पास में बैठ कर मेरा सर दबा रही थी.
-तबीयत तो ठीक हैं तेरी? माँ ने पूछा.
-हाँ...बस थोडा सा सरदर्द हैं. मैंने उठते हुए धीरे से कहा.
चल उठ जा. मैं चाय बना रही हूँ पी लेना.

माँ के जाने के बाद मैंने अपना मोबाइल चेक किया तो देखा की 10-12 मिस्ड कॉल थी. सारे के सारे किसी अननोन नंबर से थे. शायद मेरा फोन साइलेंट मोड पर था.* ये अंतस भी जाने कब मेरा पीछा छोड़ेगा.* मैंने मन ही मन सोचा. तभी वापस फोन बजा. मैंने फोन उठाया.

-क्यों बार-बार फोन कर रहे हो? मुझे तुमसे बात नही करनी हैं...मैंने गुस्से से कहा.
-ताश्री! मैं रोहित बोल रहा हूँ.* वो पूजा....
- क्या हुआ पूजा को? मैंने घबराते हुए कहा.
-वो पूजा का एक्सीडेंट हो गया हैं. जल्दी से सिटी हॉस्पिटल पहुँचो.


--------------------------------------------


आसमान में काले घने बादल छाए हुए थे. कहीं बरस चुकी बरसात की ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी जिससे मौसम सुहाना हो चूका था. एक ओपन रेस्तरां में खुले गार्डन में एक टेबल पर नंदिनी और विजय बैठे थे.
नंदिनी- तुम अपनी फेमिली को यहाँ क्यों नहीं ले आते?
विजय- मेरा कोई नही हैं.
नंदिनी- मगर तुमने तो कहा था कि तुम्हे गोद लिया गया हैं?
विजय- हाँ, मगर कुछ समय पहले ही मेरे पिता गुजर गये थे.
नंदिनी- ओह, आई एम् सोरी! तुम्हे यहाँ अकेलापन महसूस नही होता.
विजय- अकेली तो आप भी हैं.
नंदिनी- मेरी बात अलग हैं...मुझे आदत हैं.
विजय- आपने अब तक शादी नही की?
नंदिनी एक सेकंड के लिए चुप हो गयी.
नन्दिनी- मुझे शादी नही करनी हैं.
विजय- मतलब?
नंदिनी- मुझे रिश्तो से नफरत हैं?
विजय- और इस नफरत का कारण क्या हैं...डर या अनुभव?
नंदिनी- तुम्हे मुझे देख कर लगता हैं कि मुझे डरने की जरूरत हैं?
विजय- लोग अक्सर वो नही होते हैं जो वो दीखते हैं या दिखना चाहते हैं?

नंदिनी- मेरी छोड़ो. तुम अपनी सुनाओ, तुम्हे कोई नही मिला.
विजय- मैंने ऐसा कब कहा?
नंदिनी- मतलब की तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई हैं?
विजय- हैं नही थी.
नंदिनी- छोड़ कर चली गयी?
विजय- हां...हमेशा के लिए.
नंदिनी- ओह...आई एम् सोरी.
अब तक दोनों खाना खा चुके थे. वेटर बिल लेकर आ चूका था. विजय ने बिल पे किया.
नंदिनी- एक सेकंड...मैं वाशरूम जाकर आती हूँ.
नंदिनी उठकर वाशरूम के लिए निकल गयी. अंदर कांउटर पर एक लड़की बैठी थी. नंदिनी ने उससे पूछा, एस्क्युज़ मी, यह वाशरूम किधर हैं?
जी आप आगे से लेफ्ट ले लीजियेगा. ठीक सामने ही हैं. लड़की ने ऊपर देखकर मुस्कुराते हुए कहा. जब उस लड़की ने ऊपर देखा तो नंदिनी को वो कुछ जानी पहचानी सी लगी.
तुम...तुम पूजा हो न? नंदीनी ने पूछा.
पूजा- जी...मगर आप कौन?
नंदिनी- मैं एसीपी नंदिनी हूँ. तुम यहाँ काम करती हो?
पूजा- नहीं यह मेरे हस्बैंड का रेस्टोरेंट हैं.
नंदिनी- तुम्हारे हस्बैंड?
पूजा- जी...रोहित सिंघानियाँ...
पूजा ने एक बैसाखी पकड़कर उठते हुए कहा.
--------------------------------------------------------------------------------------------------
रेस्टोरेंट के एक कमरे में नंदिनी, विजय और पूजा तीनो बैठे थे.
पूजा- ...तो आप ताश्री के केस की फिर से जांच कर रही हैं?
नंदिनी- ऑफिशियली नही...बस अपने लेवल पर.
पूजा- किसलिए?
नंदिनी- मैं ताश्री के कातिल को सालाखो के पीछे पहुँचाना चाहती हूँ.
पूजा- ...और आप भी अंतस को ही कातिल मान रही हैं.
नंदिनी- क्यों, तुम्हे ऐसा नही लगता?
पूजा- अंतस ताश्री से बहुत प्यार करता था, ताश्री को छोटी सी खरोंच भी आये तब भी वो बर्दाश्त नही कर पाता था, मैंने देखा था उस दिन जब ताश्री बेहोश हो गयी थी, अंतस ने ताश्री को किसी बच्ची की तरह संभाला था...और आपको लगता हैं कि ताश्री को अंतस ने मारा हैं.
विजय- किसी के दिल में क्या हैं यह कौन जान सकता हैं, तुम अंतस को जानती ही कितना हो?
पूजा- इंस्पेक्टर विजय! मैं अंतस को तो ज्यादा नही जानती थी मगर ताश्री को अच्छी तरह से जानती थी और अंतस के साथ ताश्री खुद को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करती थी.
नंदिनी- तब भी ताश्री के असली हत्यारे को सजा मिलना जरुरी हैं. इसलिये जो कुछ भी तुम जानती हो बता दो.
पूजा- मुझे जो कुछ भी मालुम था वो तो मैं पहले ही इंस्पेक्टर विजय को बता चुकी हूँ.
नंदिनी- हां, मगर कुछ ऐसा जो तुम उस वक्त न बता पायी हो, या फिर तुम्हे बाद में पता चला हो, आखिर तुम ताश्री की सबसे अच्छी दोस्त थी.
पूजा कुछ देर शुन्य में देखने लगी. हां बिलकुल. ताश्री मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी. लेकिन मैं सबकुछ पहले ही बता चुकी हूँ. मेरे पास अब नया कुछ नही हैं. अब अगर आप इज़ाज़त दे तो मैं जाना चाहूंगी, अभी वीकेंड हैं तो बहुत रश चल रही हैं रेस्टोरेंट में...
नंदिनी- हां क्यों नही..
पूजा का यह बर्ताव नंदिनी की उम्मीदों के बिलकुल विपरीत था. उसे लगा था की ताश्री के केस की वापस जांच के बारे में सुनकर वो खुश होगी.
नंदिनी- यह इतना रुखा बर्ताव क्यों कर रही थी?
विजय- इतना सब सहने के बाद किसी से उम्मीद भी क्या की जा सकती है?
नंदिनी- मतलब?
विजय- जब ताश्री का मर्डर हुआ था, इसकी शादी होने वाली थी, एक तो सबसे अच्छी दोस्त को खोने का गम, एक्सीडेंट का सदमा और उपर से पुलिस की रोज रोज की पूछताछ से ये परेशान हो गयी थी. तब इसके परिवार वालो ने एसीपी सर से स्पेशल रिक्वेस्ट की थी, उससे इस केस में और पूछताछ न की जाए.
नंदिनी- हम्म...मतलब याग्निक की तरह यह भी एक डेड एंड ही हैं.
विजय- ऐसा ही समझ लीजिये.
तभी नंदिनी को किसी का फोन आया. बात करने के बाद विजय ने पूछा. कल कहीं जाना हैं?
नंदिनी- हां, वो आश्रम में रेनोवेशन करवाया हैं और संसथापक की एक मूर्ति भी लगवाई हैं, वो चाहते हैं की मैं उसका आनावरण करूँ.
विजय- यह तो काफी अच्छी बात हैं.
नंदिनी- हां मगर दिन का प्रोग्राम हैं.
विजय- तो तुम कल थाने से छुट्टी ले लो...आई मीन आप..
तुम चलेगा. नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा.


मैं जल्दी से सीटी हॉस्पिटल पहुंची. पूजा के मम्मी पापा भी वहीँ थी. उन दोनों का रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था. उनके कोई रिश्तेदार थे साथ में जो उन्हें ढाढस बंधा रहे थे. मैं उनके पास गयी लेकिन ज्यादा बात नही कर पायी. कुछ देर में मुझे सामने से रोहित दवाइयां लेकर आता दिखा. वो दवाइयां देकर मेरे पास आया.
-ये कैसे हुआ?
-रोड क्रोस करते हुए, कोई कार वाला टक्कर मारकर चला गया.
-मगर तुम्हे कैसे पता चला?
-पूजा मुझसे ही मिलने आई थी.
-अब कैसी हैं वो?
-डॉक्टर ऑपरेट कर रहे हैं, अभी कुछ बताया नही हैं.
मुझे रोना आ गया. मैं वही पास ही बेंच पर ही बैठ गयी. रोहित भी काफी दुखी लग रहा था. कुछ देर बाद में सामान्य हुई.
-पूजा तुमसे क्यों मिलने आई थी.
-मैंने उसे फोन करके बुलाया था.
-किसलिए?
-वो...दरअसल... वो आगे कुछ बोल नही पाया.
-तुम पूजा से प्यार करते हो न? मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा.
-हां..मगर तुम्हे कैसे पता?
-उस दिन वो चिट्टी तुमने पूजा के लिए लिखी थी, लेकिन पूजा कुछ समझ नही पाई और उसने वो मुझे लाकर दे दी.
-तुम्हे पता था तो उस दिन क्लास में...
-मुझे बाद में पता चला था.
वास्तव में परसों जब पूजा ने रोहित को थप्पड़ मारा था और उसको नियंत्रित करने के लिए मैं उसके दिमाग में घुसी थी. मुझे तभी इस सब के बारें में पता चला था.

- मैंने पूजा को अपने दिल की बात कहने के लिए ही बुलाया था. रोहित ने कहा.
- और उनसे क्या कहा?
- सोच कर बताउंगी. वो जाने के लिए मुड़ी ही थी कि पता नही कहाँ से वो कार आ गयी.
तभी डॉक्टर ओटी से बाहर निकले. सब उनके पास घेरा बनाकर खड़े हो गए.
-सीरियस स्पाइनल इंजरी हैं, हमें स्पेशलिस्ट को बुलाकर ऑपरेशन करवाना होगा. 15 से 20 लाख का खर्चा होगा. वरना लड़की पूरी ज़िन्दगी खड़ी नही हो पाएगी. डॉक्टर ने बताया.
हम सब सुनकर स्तब्ध रह गए. मैं पूजा के परिवार की हालत जानती हूँ इतनी बड़ी रकम लाना उनके लिए बहुत मुश्किल था. रोहित और मैं वापस आकर अपनी जगह बैठ गये. तभी सामने से मुझे अंतस आता दिखा.
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14. मदद

Post by smenaria on Fri Jul 08, 2016 12:41 pm

तभी सामने से मुझे अंतस आता दिखा. मैं उठ कर उसके पास गयी.

-पूजा कैसी हैं? उसने पूछा.
-तुम यहाँ क्या कर रहे हो?
-मैं अपनी दोस्त से मिलने आया हूँ.
-पूजा तुम्हारी दोस्त कबसे हो गई?
-उस दिन जब तुम छह घंटे के लिए बेहोश थी.
इससे बहस करना बेकार था.
-वो काफी सीरियस हैं, डॉक्टर ने ऑपरेट करने के लिए बोल रहे हैं. काफी ज्यादा खर्चा आएगा.
-ओह..वो ठीक तो हो जाएगी न?
-कुछ कह नही सकते हैं.
हम दोनों रोहित के पास जाकर बैठ गये. पूजा के पापा और रिश्तेदार फोन पर फोन कर रहे थे. मैं उठकर पूजा के मम्मी के पास गई. वो भी काफी परेशान लग रही थी.
-क्या हुआ आंटी?
-डॉक्टर आज रात को ही ओपरेशन करने के कह रहे हैं...अब इतनी जल्दी इतने पैसो का इंतजाम कहाँ से करेंगे? कुछ भी करें तब भी ज्यादा से ज्यादा 5-7 लाख ही हो पाएंगे.
-आप धीरज रखिये, कोई न कोई रास्ता जरुर निकल आएगा.
मैं वापस रोहित के पास आ गई. मैं पूजा के लिए बहुत परेशान थी. मैं उसे एक मुसीबत से निकल चुकी थी पर अब इस मुसीबत से कैसी निकालू कुछ समझ में नही आ रहा था. तभी मेरी नज़र रोहित पर पड़ी.
-रोहित मुझे तुमसे कुछ बात करनी हैं. मैंने कुछ सोचकर कहा. रोहित और मैं कुछ दूर चले गये.
रोहित तुम्हे पता ही हैं, पूजा के ऑपरेशन के लिए 20 लाख रुपयों की जरुरत हैं, उसके पापा ज्यादा से ज्यादा 5-7 लाख ही कर पायेंगे और ऑपरेशन आज रात को ही करना हैं. अगर तुम अपने पापा से ले सकते तो पूजा के पापा 5-10 दिन में वापस कर देंगे.
-हां...मगर...रोहित ने कुछ सोचते हुए कहा .
-मैं जानती हूँ रोहित यह तुम्हारे लिए भी आसान नही हैं. लेकिन अभी इसके अलावा और कोई रास्ता भी नही हैं. तुमने उस दिन कहा था न कि कोई मुझसे प्यार नही कर सकता हैं...मैं इसके लायक ही नहीं हूँ. मेरी नज़रे अंतस की और चली गई. शायद तुम सही थे. मगर क्या तुम किसी से प्यार कर सकते हैं और अगर करते हो तो क्या तुम उसे साबित कर सकते हो?
रोहित कुछ देर खामोश खड़ा रहा और फिर बाहर की और जाने लगा.
-कहाँ जा रहे हो? मैंने पूछा.
-अपने प्यार को साबित करने. मैं उसे जाते हुए देखती रही फिर कुछ देर बाद अंतस के पास आ गई. वो कुछ देर खामोश बैठा रहा और फिर बोला.
-मुझे पूजा के लिए अफ़सोस हैं. चिंता मत करो वो जल्दी ही ठीक हो जाएगी.
-तुम्हे किसी बात का अफ़सोस हैं. मैंने उसे हिकारत भरी नजरो से देखकर कहा. पांच घंटे के दोस्त के लिए भला कौन अफसोस करता हैं.
-रिश्ते वक्त से नही ज़ज्बातो से बनते हैं. किसी से रिश्ता बनाने के लिए पांच घंटे ही बहुत होते हैं तो किसी के लिए सारी उम्र भी कम पड़ जाती हैं.
- तुम रिश्तो के बारे में क्या समझोगे, तुम तो रिश्तो की नीव ही साजिशों की रखते हो.
-सच कई बार उलझा हुआ होता हैं, उसकी गांठे वक्त के साथ खोलना ही बेहतर होता हैं. सच न कहना हमेशा झूठ ही नहीं होता, यह कई बार रिश्तो को बचाने के लिए ज़रूरी भी होता हैं.
मैं चाहे यह मानु या न मानु मगर अंतस की बाते मुझे मंत्रमुग्ध सी कर देती थी. किसी नशे की तरह जिसके बहाव में मैं बहती चली जाती थी.
-तुम यहाँ पूजा के लिए नही मेरे लिए आये हो न?
- तुम्हारे पास यह मानने की वजह हैं मगर यह सच नही हैं. मैं अपना सामान पहले ही पैक कर चूका हूँ.
-तुम शहर छोड़ कर जा रहे हो. तुम्हारा काम ख़तम हो गया?
-काम...मेरा कोई काम नहीं हैं...मैं यहाँ सिर्फ तुम्हारे लिए आया था.
---------------------------------------------------
अगले दिन अनाथाश्रम से लौटते वक्त नंदिनी पूजा के रेस्टोरेंट पर ही रुक गयी. अंदर काउंटर पर एक आदमी बैठा था. नंदिनी ने अंदाजा लगा लिया यह रोहित ही था.
-पूजा कहाँ मिलेगी? नंदिनी ने पूछा.
-जी आप कौन?
-मैं उसकी दोस्त हूँ.
-आप दो मिनट बैठिये मैं बुला कर लाता हूँ.
कुछ ही देर में पूजा सामने थी.
-जी आप? मगर रोहित ने तो मुझसे कहा था कि मेरी कोई दोस्त आई हैं.
- हां, मैंने उससे यही कहा था. मैं उसे बेवजह परेशान नही करना चाहती थी.
- हम्म थैंक्स. मगर मैने पहले ही कहा था कि मैं सबकुछ बता चुकी हूँ.
-मुझे मालुम हैं. देखो पूजा...मैं जानती हूँ कि इस केस में पहले ही तुम्हे काफी परेशान किया जा चूका हैं. मगर मैं यह जांच अलग तरीके से कर रही हूँ. अगर कुछ भी ऐसा हैं जो किसी कारण से तुमने पहले नही बताया हो, तुम मुझे बता सकती हो.
-मगर आप दुसरो से अलग कैसे हैं?
-याग्निक... नंदिनी कुछ देर के लिए रुक गयी.
-हां...एसीपी चतुर्वेदी ने मुझे बताया था कि ताश्री ने हमारे बारें में अपनी डायरी में लिखा था तो?
-मैं उसे पहले से जानती थी.
पूजा आश्चर्य से नंदिनी को देखने लगी.
मैं कभी उससे प्यार करती थी. आज से लगभग पांच साल पहले की बात हैं..
-मगर याग्निक की तो शादी हो चुकी थी.
-हां मुझे बाद में पता चला था. तुम्हारी तरह में भी उसके जाल में फंस गयी थी. तुम खुशकिस्मत थी कि तुम बच गई. तुम्हारे साथ ताश्री थी.
-कमीना कहीं का...पूजा की आँखे गुस्से से लाल हो गयी.
-पूजा ताश्री ने सिर्फ तुम्हारे नही मेरे भी गुनाहगार को सजा दिलाई थी. ताश्री के हम दोनों पर अहसान हैं. यहीं वो कारण हैं जिसके लिए मैं ताश्री के कातिल को सजा दिलवाना चाहती हूँ. अगर तुम कुछ भी जानती हो जो की इस केस में मेरी मदद कर सकता हैं तो प्लीज मुझे बता दो.
पूजा कुछ देर के लिए खामोश हो गई.
-उस दिन जब ताश्री अंतस के कमरे में बेहोश थी, अंतस को किसी का फोन आया था, कोई ऋषि नाम का आदमी था. अंतस उसे बड़े भाई कह कर बुला रहा था. वो बार बार किसी संगठन का नाम ले रहा था. वो कहा रहा था की यहाँ का काम बहुत जल्द ही ख़त्म होने वाला हैं, फिर वो वापस लौट जायेगा.
-यहाँ का काम... मगर अंतस तो यहाँ सिर्फ एक ही काम से आया था. नंदिनी ने मन ही मन में कहा.

----------------------------------------

महोब्बत मौत है मितवा,
बार बार नही होती,
हसरते खिलती हैं मगर,
गुलज़ार नही होती,
आँखे करती हैं हरगिज़ ज़फ़ा,
भर आती हैं मगर जार-जार नही रोती,
एक बार ओढ़ी थी वफ़ा की चादर,
बिखरती हैं मगर तार-तार नही होती..
जो उल्फत की थी तो हो गई महोब्बत भी,
अब फिर से इकरार नही होता, तकरार नही होती...

नंदिनी एक रेस्टोरेंट में अकेली बैठी थी. रेस्टोरेंट के चारो और ग्लास लगे हुए थे. यह देर शाम का समय था. रेस्टोरेंट के अन्दर मंद-मंद संगीत चल रहा था, जो माहोल को रोमांटिक बना रहा था मगर नंदिनी तो एक अजीब ही दुविधा में फंसी हुई थी. वो सोच रही थी कि आखिर वो कहाँ से कहाँ तक आ गयी हैं. उसने कभी सोचा भी नही था कि वो यहाँ तक आ पायेगी. लेकिन अजीब बात हैं, जब उसने शुरुआत की तब उसके साथ कितने लोग थे मगर आज वो बिलकुल अकेली थी. रास्ते में कुछ मुसाफिर मिले भी तो वो भी केवल दर्द ही देकर गए. शायद उसे भी अब अकेली रहने की आदत पढ़ चुकी थी या फिर किसी के साथ से ही डर लगने लगा था. मगर शायद वो अब अकेली नही थी, वो विजय के बारें में सोचने लगी थी. वो उसे शुरू से अच्छा लगता था, विजय में एक स्थिरता थी, उसकी आँखों में एक सम्मान था, उसके साथ में अपनापन था. वह सुलझा हुआ समझदार इंसान था मगर नंदिनी ने कभी उसे उस नज़रिये से नही देखा था. मगर इन दिनों उन दोनों के बीच नजदीकियां ज्यादा ही बढ़ रही थी. वो चाहती तो विजय को रोक सकती थी मगर उसे इसमें कुछ गलत भी नही लग रहा था...
नंदिनी रेस्टोरेंट के शीशे से बाहर देखते हुए यह सब सोच रही थी तभी नंदिनी की नज़र सामने एक दूकान पर पड़ी. यह एक पर्स की दूकान थी. अभी-अभी इस दूकान में कोई गया था. नंदिनी को वो शक्ल जानी पहचानी लगी. उसने फटाफट काउंटर पर बिल दिया और बाहर आ कर इंतज़ार करने लगी.
कुछ देर बाद उस दूकान से वो लड़की बाहर निकली. नंदिनी ने उसे ध्यान से देखा. उसकी आंख्ने फटी की फटी रह गयी. उसे अपनी आँखों पर विश्वास नही हो रहा था. यह तो ताश्री हैं!!
नीली टीशर्ट, काली जींस, गले में एक मफलर, चेहरे पर एक बच्चे जैसी मासूमियत...ऐसा लग रहा था एक बच्ची बस उम्र में बड़ी हो गयी हो. उसकी आँखों पर चश्मा नही था पर चेहरे पर एक मुस्कान थी. हाथ में बैग लिए, मन ही मन कुछ सोचते हुए मुस्कुराते हुए जा रही थी. जैसे अपने किसी करतब पर खुश हो रही हो. नंदिनी कुछ पल तक एक टक उसे निहारती रही जैसे किसी माँ को अपना खोया हुआ बच्चा मिल गया हो.
नंदिनी उसका पीछा करने लगी. कुछ देर चलने के बाद आगे बाइक पर एक लड़का हाथ में एक बेग लिए खड़ा था. शायद यह अंतस था. उसके बैग में ख़रीदे हुए कपडे थे.
अंतस- इतना वक्त लगता हैं तुम्हे एक बैग खरीदने में...मैंने सारे कपडे खरीद लिए और आधे घंटे से यहाँ खड़ा हूँ.
ताश्री- वो दूकान वाला सरासर पागल बना रहा था, ६०० का पर्स १५०० में बेच रहा था. मैंने भी कह दिया मैं उसके दिल्ली वाले सप्लायर वर्मा की बेटी हूँ. बेचारा फ्री में देने के लिए तैयार हो गया था. ताश्री ने चहकते हुए कहा.
अतंस- तुम कब इन भोले भाले दुकानदारो को ठगना छोडोगी ताश्री!
ताश्री- जब ये मुझे ठगना छोड़ देंगे. ताश्री ने मुस्कुराते हुए कहा.
नंदिनी का शक अब पक्का हो गया था, यह ताश्री ही थी. ताश्री बाइक पर बैठी ही थी कि नंदिनी दौड़ कर उनके पास पहुँच गई. उसने उनपर अपनी बन्दुक तान दी, रुक जाओ ताश्री...नंदिनी ने चिल्लाकर कहा.
ताश्री ने एक बार नंदिनी को घुरा.
तुम बहुत दूर आ चुकी हो नंदिनी. ताश्री ने नंदिनी को घूरते हुए ही कहा.
मतलब?
यह रास्ता सही नही हैं. ताश्री ने उधर देखा. वहां से एक ट्रक आ रही थी. ट्रक नंदिनी को चपेट में लेती हुई निकल गयी.
अचानक नंदिनी की नींद खुल गयी. बड़ा अजीब सपना था. वो पुरी पसीने तरबतर हो गयी थी. उसका सर भी काफी भारी हो रहा था. उसने घडी की और देखा तो सुबह के दस बज रहे थे. वो फताफट तैयार हुई और थाने के लिए निकली.


----------------------------------


-तुम शहर छोड़ कर जा रहे हो. तुम्हारा काम ख़तम हो गया?
-काम...मेरा कोई काम नहीं हैं...मैं यहाँ सिर्फ तुम्हारे लिए आया था.
तभी मेरा फोन बजा. यह माँ का फोन था.
-तू कौन से वार्ड में हैं?
-C-3 में क्यों?
-मैं यहाँ हॉस्पिटल में हूँ.
-आप यहाँ हॉस्पिटल में क्या कर रही हैं?
-तेरे लिए खाना लेकर आई हूँ और पूजा के मम्मी पापा से भी मिल लुंगी.
-आप निचे ही रुको मैं आती हूँ. मैंने फोन रखा.
कौन था. मेरे फोन रखते ही अंतस ने पूछा.
मेरी माँ हैं.
तुम्हारी माँ...यहाँ हॉस्पिटल में हैं?
हां...क्यों?
नही..कुछ नही. अंतस खड़ा हो गया.
तभी सामने से माँ आती दिखाई दी. माँ ने पहले मेरी और देखा और फिर अंतस की ओर...उनकी नज़रे अंतस पर ही टीक गयी. वो उसे घूरते हुए ही मेरे पास आई.
- अब पूजा कैसी हैं? उन्होंने मेरी और देखते हुए कहा.
- अभी कुछ पता नही चल रहा हैं, ऑपरेशन के लिए कह रहे हैं.
- तू रात यही रुकेगी?
- हां..मैंने धीरे से कहा.
- हम्म...मैं इसीलिए तेरे लिए खाना लेकर आई हूँ. परेशान मत होना सब ठीक हो जाएगा.
अंतस वापस बेंच पर बैठ गया था. माँ ने दो तीन बार नज़रे चुराकर अंतस की ओर देखा. फिर वो पूजा के माँ-बाप से मिलने चली गयी.
मैं अब चलता हूँ. माँ के जाते ही अंतस ने कहा.
हम्म...मैंने कोई जवाब नही दिया. जैसे मुझे इससे कोई फर्क नही पड़ता हो.
उसके जाने के बाद मैं वही बैठ गयी. कुछ देर बाद माँ वापस आ गई.
- काफी महंगा ऑपरेशन हैं? माँ ने मेरा पास आकर कहा.
- हां...पूजा के परिवार वाले पता नही इतने पैसे कहा से लायेंगे.
-हम्म...वो जल्दी ही ठीक हो जाएगी. तू चिंता मत कर.
वो लड़का कौन था. माँ ने कुछ देर रुककर कहा.
-कौन...अंतस?
-हां..वही जो अभी यहाँ खड़ा था.
-वो पूजा का दोस्त हैं.
-हम्म...ठीक हैं मैं जा रही हूँ तुम अपना ख्याल रखना.

शाम को कोई 9.00 बजे का वक़्त था. पूजा की माँ और मैं दोनों बैठे हुए थे. कुछ दूर पूजा के पापा उनके रिश्तेदार के साथ कुछ बात कर रहे थे. शायद पैसो की व्यवस्था कर रहे हो. तभी एक अंकल आये.
जी वो पूजा के पेरेंट्स? उन्होंने हमारे पास आकर पूछा.
मैं उसकी माँ हूँ. पूजा की माँ ने कहा. अब तक पूजा के पापा और रिश्तेदार भी हमारे पास आ गए थे.
- मैं रोहित का पिता हूँ. उस व्यक्ति ने पूजा के पापा से कहा.
- रोहित? पूजा के पापा ने सवालिया अंदाज में कहा.
- वो लड़का जो पूजा को यहाँ लेकर आया था. मैंने उन्हें समझाते हुए कहा.
- मैंने ऑपरेशन का खर्चा काउंटर पर पे कर दिया हैं. डॉक्टर्स बहुत जल्दी ही ऑपरेशन शुरू कर देंगे. डॉक्टर माथुर मेरे फ्रेंड ही हैं. आपको चिंता करने की जरुरत नही हैं.
- जी..मगर...आपने...पूजा के पापा कुछ बोल ही नही पाए. शायद उन्हें कुछ समझ में नही आ रहा था.
-थैंक्स अंकल...पूजा के पापा हो सकेगा जितना जल्दी आपको वापस लौटा देंगे. मैंने कहा.
- नही बेटा उसकी जरुरत नही हैं. उन्होंने कहा. मैं और पूजा के पापा दोनों उन्हें आँखें फाड़ कर देखने लगे.
- शायद आपको मालुम नही हैं...मेरा बीटा आपकी बेटी से प्यार करता हैं. आज जब वो पूजा के ऑपरेशन के लिए मुझसे पैसे मांगने आया तो मैंने मना कर दिया. मगर फिर उसने सुसाइड करने की कोशिश की.
- सुसाइड!! हम सब चौंक गये.
- वो अब कैसा हैं? पूजा के पापा ने घबराते हुए पूछा.
- वो अब ठीक हैं...अच्छा हुआ की हम ऐन मौके पर पहुँच गए वरना कुछ भी अनर्थ हो सकता था.
- भगवान् का शुक्र हैं. हमने राहत की सांस ली.
- हम कई बार अपने बच्चो को समझने में कितनी बड़ी गलती कर देते हैं. हम जिसे उनकी नादानियाँ समझते हैं वो बड़ी जिम्मेदारी होती हैं. अगर आपको कोई ऐतराज़ न हो तो पूजा के ठीक होते ही मैं उसकी शादी रोहित के साथ करवाना चाहता हूँ.
पूजा के मम्मी-पापा की आँखे आसुओं से भर गयी थी. वे कुछ भी नही बोल पाए.
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15. आत्महत्या

Post by smenaria on Fri Jul 08, 2016 12:45 pm

वो फटाफट तैयार हुई और थाने के लिए निकली. थाने पहुंची तो नंदिनी ने देखा की थाने में कोई नही था. उसने पहरेदार से पूछा कि सब कहाँ गए. पहरेदार ने बताया कि कोई केस आया हुआ हैं, विजय सर जाब्ता लेकर गए हुए हैं. नंदिनी ने विजय को फोन करके पूछा तो उसने बताया कि किसी पेट्रोल पम्प पर गाँव वालो का झगडा हो गया था. स्थित अब नियंत्रण में थी. वो कुछ ही देर में लौटने वाले हैं.
नंदिनी अपने केबिन में आ गई और कुछ फाइल्स देखने लगी. तभी उसे किसी फाइल की जरुरत महसूस हुई तो उसने पहरेदार को आवाज लगाईं. हो सकता हैं चाय पीने गया हो. नंदिनी ने मन ही मन में सोचा और खुद ही उठकर फाइल लेने चली गयी.
स्टोर रूम में ढेर सारी फाइलें थी. फाइलों का अम्बार लगा हुआ था. कुछ ही देर में नंदिनी को समझ में आ गया कि फाइलें इंडेक्स से नही जमी हुई हैं और उसे मेहनत करनी होगी. वो फाइल ढूढने के लिए इधर-उधर देखने लगी. कुछ रेक देखने के बाद उसकी नज़र एक अलमारी पर पड़ी, उसने उसमें ढूंढा मगर उसमें भी कुछ नही था. तभी उसकी नज़र कबडड के पीछे बनी अलमारी में गयी. कब्बड उसके आगे पड़ा था मगर एक छोटी सी दरार थी उसमें से एक पीला पैकेट दिख रहा था. नंदिनी ने हाथ उस दरार में हाथ डाल कर वो पैकेट बाहर निकाला. उस पैकेट के नीचे ही एक फोल्डर पड़ा था. नंदिनी ने वो फोल्डर भी उठा लिया. वो इन दोनों को लेकर वापस ऑफिस में आ गयी.
नादिनी ने वो फोल्डर खोला तो उसके अन्दर एक पोस्टमार्टम रिपोर्ट पड़ी थी, दिव्या नाम की किसी लड़की की. रिपोर्ट देखने के बाद नंदिनी ने वो पैकेट खोला. उसमें एक डायरी थी. उसने डायरी खोलकर देखा. यह ताश्री की डायरी थी.

कुछ ही देर में विजय और बाकि सब लोग भी आ गए. थोड़ी देर बाद विजय नंदिनी के केबिन में आया.
तुम आ गयी. मुझे लगा आज छुट्टी पर हो. विजय ने बैठते हुए पूछा.
हम्म...नंदिनी जैसे उसे नज़रअंदाज किया. यह दिव्या कौन हैं? नंदिनी ने पूछा.
-दिव्या...कौन दिव्या मैडम? विजय ने थोड़े आश्चर्य से पूछा. मैडम सुनते ही नंदिनी ने विजय की ओर देखा.
आई मीन नंदिनी. विजय ने अपनी भूल सुधारते हुए कहा.
मुझे यह पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली थी. नादिनी ने रिपोर्ट विजय को दिखाते हुए कहा.
क्या नंदिनी? पहले वो ताश्री फिर यह दिव्या! तुम भी क्या गड़े मुर्दे उखाड़ने पर तुली हो? विजय ने नंदिनी के हाथ से वो रिपोर्ट लेकर देखते हुए कहा.
यह रिपोर्ट बिना किसी केस फाइल के पड़ी हुई थी. नंदिनी ने स्पष्ट करते हुए कहा.
अरे हां... याद आया. एक बार हॉस्पिटल वालो ने हमें गलत पेशेंट की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भेज दी थी. शायद यह वहीँ हैं. मैंने कहा था इसे रद्दी में दे देना.
अच्छा हुआ नही दी, वरना ताश्री की डायरी भी रद्दी में चली जाती. नंदिनी ने टेबल पर पड़ी डायरी की तरफ इशारा करते हुए कहा.
-अरे वाह..यह तुम्हे कहाँ मिल गयी. मैं ढूंढ-ढूंढ कर थक गया था.
-इसी रिपोर्ट के साथ ही पड़ी थी, कबडड के पीछे.
-तभी मुझे नहीं मिली. चलो अच्छा हुआ झंझट छुटा.
-...और वो रामनायक के शुटर्स से कुछ पता चला? नंदिनी ने डायरी अपनी रैक में रखते हुए कहा.
-हां मैडम...मूर्तियों की स्मगल्लिंग कर रहे थे.
-मगर एक ही तरह की इतनी सारी मूर्तियाँ कहा लेकर जा रहे थे.
-वो तो कुछ बता नही रहे हैं...कह रहे हैं किसी स्टेचू डीलर के पास ले जा रहे थे, मगर नाम नही बता रहे हैं.
-चलो मैं पूछती हूँ. मैं पूछ चूका हूँ मैडम...आपके हाथ का दर्द.
-अब ठीक हैं...चलो थोड़ी कसरत भी हो जाएगी.
-मैडम मुझे कहीं बाहर जाना हैं, मैं जाकर आता हूँ.
-हम्म...ओके...जल्दी ही जाना..हमें मदनलाल के केस पर भी काम करना हैं.
-जी मैडम...विजय ने कहा और फाइल लेकर बाहर चला गया.
----------------------
नंदिनी सेल में गयी और ड्राईवर से पूछताछ करने लगी मगर आधे घंटे तक पूछताछ करने के बाद भी कुछ ख़ास पता नही चला पाया.
बहुत ढीठ हैं साले. उगलना तो तुमको पड़ेगा. नंदिनी ने जेल का गेट बंद करते हुए कहा.
मैडम मुझे एक फोन करना हैं. तभी उनमें से एक ड्राईवर ने कहा.
किसे? नंदिनी ने पूछा.
जी मेरी घरवाली को...चार दिन से कुछ खोज-खबर नहीं हुई है तो परेशान हो रही होगी.
हम्म...ठीक हैं हवालदार इसे फोन करवा दो. नंदिनी ने हवालदार से कहा और अपने केबिन में आ गयी. फोन नंदिनी के केबिन के पीछे की तरफ ही था. जिसके ऊपर एक रोशनदान बना हुआ था. नंदिनी को बाहर की आवाज सुनाई दे रही थी.
जय महाकाल...मैं नीलकंठ...उस ड्राईवर ने फोन पर कहा.
....ट्रक को पुलिस ने पकड़ लिया हैं, अभी हम जेल में हैं...
जी हां...संगठन का कार्य हैं...मेरी उपस्थिति अनिवार्य हैं...आपको कोई न कोई उपाय अवश्य निकालना होगा. ...
...सभा का सञ्चालन मुझे ही देखना हैं....
धन्यवाद...आभार आपका..
ड्राईवर फोन रखकर वापस अपने सेल में चला गया. नंदिनी भी कुछ फाइल्स देखने लगी, तभी उसका फोन बजा. फोन कमिश्नर का था.
जी कमिश्नर साहब. नंदिनी ने सतर्क होते हुए कहा.
मिस नंदिनी आपने एमजी रोड के ढाबे से दो लोगो को गिरफ्तार किया हैं.
जी कमिश्नर साहब उन्होंने हमारें हवालदार पर फायरिंग की थी और वे मूर्तियों की स्मगलिंग कर रहे थे.
मिस नंदिनी...आपसे एक भूल हुई हैं, उनमें से एक व्यक्ति ट्रक का ड्राईवर हैं मगर दूसरा नीलकंठ, वो बेगुनाह हैं. वो तो बस उसके साथ वहां बैठकर खाना खा रहा था. आप उसे अभी रिहा कीजिये.
लेकिन सर उसने...
लेकिन वेकिन कुछ नही मिस नंदिनी. आप वैसे भी एक निर्दोष व्यक्ति को दो दिन जेल में रख चुकी हैं. उसका वकील अभी जमानत के कागजात लेकर आ रहा हैं. आप उसे अभी रिहा कीजिये.
इतना कह कर कमीशनर ने फोन रख दिया.
नंदिनी सीधा उठ कर उस ड्राईवर के सेल में गयी और खीच कर उसके कान के नीचे दो झापड़ लगाये.
किसे फोन गया था बे तूने? नंदिनी ने गुस्से में पूछा.
जी मैडम...वो..घरवाली को किया था...
और फोन करने के 5 मिनट में तेरे बाप का फोन आ गया. साले हैं कौन तू जो तुझे छुडाने के लिए खुद कमिश्नर फोन कर रहा हैं और यह संगठन क्या हैं?
संगठन...जी वो हमारा जयपुर ट्रांसपोर्ट आर्गेनाईजेशन हैं.
और तुझे कौनसी मीटिंग में जाना हैं?
हमारे आर्गेनाईजेशन की ही मीटिंग हैं?
कब?
कल ही हैं..
तभी हवलदार ने टोका. मैडम वो इसका वकील आया हैं.
अरे वाह! बड़ा जल्दी आ गया. नंदिनी ने सेल से बाहर निकलते हुए कहा.
एक काम करो, तुम चेक करो कल जयपुर ट्रांसपोर्ट ऑर्गनाइजेशन की कोई मीटिंग हैं क्या? नंदिनी ने हवालदार से कहा और अपने केबिन में आ गयी.
उसने बाहर आकर चेक किया सारे डॉक्यूमेंट सही थे, उसे छोड़ने के अलावा और कोई चारा नही था.
नंदिनी ने उसे रिहा कर दिया. उसके जाने के बाद उसने एक हवालदार को बुलाया.
एक काम करो, इस पर नज़र रखो. जहाँ इसका वकील इससे अलग हो वहां से इसे उठा कर वापस ले आओ.
कुछ ही देर में हवालदार उस ड्राईवर को पकड़कर वापस ले आया.
एक काम करो, इसे पीछे वाले लॉकअप में डाल दो. नंदिनी ने उस हवालदार से कहा.
कुछ देर बाद विजय भी वापस आ गया. नंदिनी ने पूरा माजरा विजय को बताया.
तुम्हे उस तरह जमानत पर रिहा किये हुए व्यक्ति को वापस नही लाना चाहिए था. विजय ने समझाया.
तो क्या करती जिसने मुझ पर गोली चलायी उसे ऐसे ही छोड़ देती.
मगर फिर भी अगर कमिश्नर ने खुद फोन किया था तो जरुर कुछ ख़ास रहा होगा.
कुछ भी हो जब तक मैं इन मूर्तियों और इस संगठन के बारें में पता नही कर लेती कोई रिहा नही होगा. नंदिनी गुस्से में थी.
कुछ देर बाद वो शांत हुई. मैं लंच लेकर आती हूँ. नंदिनी ने निकलते हुए कहा.
जी मैडम.

कुछ देर बाद नंदिनी वापस आई. वो विजय के साथ बैठकर कुछ फाइल्स डिस्कस करने लगी.
तभी एक हवालदार दोड़ते हुए आया.
वो...मैडम...
वो पसीने में भीगा हुआ था. उसकी सांस फुल गयी थी.
क्या हुआ? नंदिनी ने खड़े होते हुए पूछा.
मैडम...वो ड्राईवर ने आत्महत्या कर ली हैं.
उसने सांस लेते हुए कहा.

----------------------------------

05/02/2013
3-4 दिन से हॉस्पिटल घर और घर से हॉस्पिटल यहीं रूटीन था. पूजा को होश आ गया हैं, उसकी तबियत अब ठीक हैं मगर एक पैर में फ्रैक्चर हैं. डॉक्टर ने कहा हैं कुछ दिन चलने में दिक्कत होगी मगर बाद में ठीक हो जाएगी. होश में आने पर वो थोड़े सदमे में थी. उसे कुछ समझ में नही आ रहा था कि अचानक यह सब कसी हो गया, उसे तो एक्सीडेंट कैसे हुआ यह भी कुछ याद नही था.
रोहित अगले दिन हॉस्पिटल आया था. मैंने उसे पैसो के लिए थैंक्स कहा मगर उसकी बेवकूफी के लिए उसे डांटा भी...उसने बताया कि उस दिन जब उसने घर जाकर अपने पापा से पैसे मांगे तो उन्होंने मना कर दिया. काफी मीन्नते करने के बाद भी जब वो नही माने तो उसका दिल बैठ गया और उसे इसके अलावा और कोई रास्ता ही नही सुझा.
हम कई बार लोगो को समझने में बड़ी गलती कर देते हैं. हम किसी को पहली बार देखते ही उसके बारें में कोई राय बना लेते हैं, उसे पसंद या नापसंद कर लेते हैं, उसे अच्छी तरह समझे बिना और फिर बाद में पछताते हैं. शायद कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा नहीं होता यह तो बस व्यक्ति के किरदार होते हैं, हमारा जिस किरदार से सामना होता हम उसे वहीँ मान लेते हैं. रोहित को जब मैंने पहली बार देखा तो उसे अमीर बाप की बिगड़ी हुई औलाद समझा था. मगर मैं गलत थी.
अंतस उस दिन के बाद मुझे नज़र नही आया. शायद वो चला गया था. मगर मैं उससे मिलने के लिए बैचेन हो रही थी. पता नही मुझे क्या हो रहा हैं? जब वो सामने होता हैं तो उसपर गुस्सा आता हैं उससे झगड़ा करती हूँ. मगर जब वो सामने नही होता हैं तब मैं बैचेन हो जाती हूँ. उस दिन उसने कहा था कि उसने अपना सामान पैक कर लिया हैं तो शायद वो शहर छोड़ कर चला गया हो.
मगर मैं गलत थी...
शाम को मैं हॉस्पिटल के बाहर गार्डेन में बैठी थी. सूरज डूब चूका था, मौसम ठंडा हो गया था. ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी. गार्डन में कुछ पेशेंट्स के परिजन भी बैठे हुए थे. मैं उन्हें ही देख रही थी. तभी किसी ने मुझे आवाज दी. जैसे किसी सुखी धरती पर बारिश की पहली बुँदे गिरी हो. मैं बिना पीछे देखे ही इस आवाज को पहचान गई थी. यह अंतस ही था. वो मेरे पास आ गया.
तुम अब तक गए नही. मैंने अपनी मुस्कराहट को थामते हुए कहा. मुझे लगा तुम चले गए होंगे.
मैंने सोचा एक बार नींव को दुबारा भर कर देखा जाए. अब तक तो केवल दीवारे ही बनी हैं, मकान तो अब तक बना ही नही. उसने एक पहेली सी कही.
मतलब? मैंने उठते हुए कहा.
तुमने उस दिन कहा था न कि मैं रिश्तो की नींव ही साजिशो से भरता हूँ तो इस बार सच से भरने की कोशिश करता हूँ. एक नए रिश्ते की शुरुआत करते हैं. हम दोनों साथ-साथ चलने लगे थे.
और अगर मैं कहूँ की अब मुझे कोई रिश्ता बनाना ही नहीं हैं तो? मैंने मुस्कुराते हुए कहा. मैं उसका चेहरा पढ़ रही थी ऐसा लग रहा था जैसे वो कुछ सोच रहा था.
रिश्ता तो बन चूका हैं, बात तो उसे निभाने की हैं. उसने कहा. हम दोनों चलते चलते एक गली में आ गए थे. रोडलेम्प की लाल रौशनी छाई हुई थी. सामने से कोई दो आदमी आ रहे थे.
हां...मगर रिश्ते को निभाने के लिए सच बोलने की जरुरत होती हैं और शायद तुम्हे उसकी आदत नही हैं. मैंने साफ़-साफ़ कहा.
हां...तुम ऐसा मान सकती हो मगर मैं बस सही वक्त का इंतज़ार कर रहा था.
और अब वो सही वक्त आ गया हैं. मैंने उसे घूरते हुए पूछा.
हां...शायद...
तभी सामने से आते वो आदमी हमारे सामने आकर खड़े हो गए. ये दो हट्टे कट्टे लोग थे.
अरे भाई सामने से हटो..क्यों रास्ता रोक कर खड़े हो? अंतस ने उनसे कहा.
शायद तुम ही गलत रास्ते पर चल रहे हो. उनमें से एक ने कहा. हमने ध्यान नही दिया था हमारे पीछे दो लोग और आ रहे थे. वो चारो हमें घेर कर खड़े हो गए.
बेहतर होता संगठन इससे दूर ही रहता. उसने अंतस को घूरते हुए मेरी और इशारा करते हुए कहा.
कितने आदमी हो. अंतस ने मुस्कुराकर कहा. मुझे आश्चर्य हुआ. मेरी डर के मारे हालत खराब हो रही थी. यह मुस्कुरा रहा था.
जितने भी हैं तुम्हारे लिए तो काफी हैं. उसने अंतस से कहा.
चलो देखते हैं. अंतस ने मेरी और देख कर कहा. ताश्री! अच्छा होगा तुम दूर चली जाओ.
हां...मेम..आप यहाँ से चली जाए. उनमें से एक ने कहा.
मैं चुपचाप वहां से दूर चली गयी. यह क्या हो रहा था मुझे कुछ समझ ही नही आ रहा था. मैं कुछ दूर आकर खड़ी हो गयी. मैं डर से थर-थर काँप रही थी.
उसमें से एक ने अंतस को पीछे से पकड़ने की कोशिश की...अंतस ने अपने कोहनी उसके पेट में मारी और फिर जैसे ही वो झुका उसके सर पर दे मारा...वो वहीँ नीचे बैठ गया...तभी अंतस ने उसके चेहरे पर एक लात मारी और वो जमीन पर पड़ा था.
यह किसी फिल्म के फाइट सीन जैसा था. पांच सेकंड के अन्दर ही वो शख्स जमीन पर पड़ा था.
फिर वो तीनो एक साथ अंतस पर झपट्टे. अंतस ने पीछे हटते हुए उन तीनो पर लात घुसे बरसाना शुरू कर दिए. कुछ ही देर में एक एक कर वो तीनो भी ढेर हो गए.
अगली बार उससे कहना की ढंग के आदमी भेजे. अंतस ने एक आदमी के पास जाकर कहा. वो चारो बुरी तरह से ज़ख़्मी हो गए थे. वो धीरे उठे और भाग खड़े हुए. यह तुमने अच्छा नही किया लड़के, तुम्हे इसका अंजाम भुगतना होगा. जाते-जाते एक आदमी अंतस को धमकी देकर देकर गया.
अंतस फिर मेरी तरह आया. चलो ताश्री! उसने कहा. अंतस को भी कुछ छोटे आई थी.
चलो हॉस्पिटल चलते हैं. मैंने उसे सहारा देते हुए कहा.
नही उसकी जरुरत नही हैं...मैं ठीक हूँ. उसने कराहते हुए कहा.
ये लोग कौन थे? मैंने पूछा.
राणा के आदमी थे. उसने बिना मेरी और देखते हुए कहा. मेरा सर चकरा गया. राणा के आदमी!
मगर राणा ने क्यों तुम्हारे ऊपर....
मगर-वगर कुछ नही..तुम कल सुबह ग्यारह बजे मेरे रूम पर आ जाना. मेरे पास अब ज्यादा वक्त नही हैं.
उसने ऑटो रुकवाया और उसमें बैठ कर चला गया.
मैं वापस हॉस्पिटल में आ गयी. आखिर राणा ने क्यों अंतस पर हमला करवाया. और यह संगठन क्या हैं? मुझे कुछ भी समझ में नही आ रहा था.


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16. रात

Post by smenaria on Fri Jul 08, 2016 12:47 pm

तभी एक हवालदार दोड़ते हुए आया.

वो...मैडम...

वो पसीने में भीगा हुआ था. उसकी सांस फुल गयी थी.

क्या हुआ? नंदिनी ने खड़े होते हुए पूछा.

मैडम...वो ड्राईवर ने आत्महत्या कर ली हैं.

उसने सांस लेते हुए कहा.

क्या? नंदिनी और विजय दोनों चौंकते हुए उठ खड़े हुए. दोनों तेजी से लॉकअप की तरफ भागे. ड्राईवर एक रस्सी के सहारे पंखे पर लटका हुआ था. पास ही दो हवालदार खड़े थे.

इसे निचे उतारो. नंदिनी ने चिल्लाते हुए कहा.

हवालदार तेजी से दौड़कर उसके पास गए और उसे नीचे उतारा. वो अब तक मर चूका था. एक हवालदार सफ़ेद कपडा लाया और उस पर ओढा दिया.

यह फंदे पर लटक गया तब तक तुम लोग कहाँ थे? नंदिनी पहरेदार की तरफ देखकर चिल्लाई.

पहरेदार भी डर से थर-थर काँप रहे थे.

वो मैडम....यह सेल थोडा अन्दर की तरफ हैं तो हम इधर कम ही आते हैं. एक हवालदार ने डरते-डरते कहा.

...और यह रस्सी यहाँ तक कैसे पहुंची? विजय ने पंखे के ऊपर लटकी रस्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा.

वो...रस्सी...हवलदार आगे कुछ नही कह पाया. कुछ देर बाद नंदिनी और विजय दोनों केबिन में आ गए.

यह पता नही कैसे हो गया. नंदिनी ने बैठते हुए चिंता में कहा.

नंदिनी फंसे तो हम बेहद खतरनाक हैं. एसपी के खुद फोन करने पर तुमने उस ड्राईवर को रिहा किया. रिलीज़ डाक्यूमेंट्स पर तुम्हारे साइन हैं. फिर तुम उसे उठा कर वापस जेल में डाल देती हो और वो आत्महत्या कर लेता हैं. अगर बाहर किसी को भनक भी लग गयी तो हंगामा हो जाएगा कोई यकीन नही करेगा की यह आत्महत्या हैं मर्डर नही...हम सबका सस्पेंशन पक्का हैं. विजय ने स्थिति की गंभीरता समझाते हुए कहा.

स्टाफ में से कोई मिला हुआ हैं...या फिर यह भी हो सकता हैं कि उसने कपडे सुखाने की रस्सी उठा ली हो.

तब तो इस खबर के बाहर जाने की सम्भावना और भी जयादा हैं. अब हमें क्या करना चाहिए. नंदिनी खुद पसीने से तरबतर थी.

हमें एक झूठ को छुपाने के लिए दूसरा झूठ बोलना होगा. मगर हो सकता हैं यह तरिका तुम्हे ज्यादा पसंद नही आये. विजय ने नंदिनी की तरफ देखते हुए कहा.

तुम्हे जो करना हैं वो करो, मुझे तो कुछ सूझ ही नही रहा हैं.

विजय बाहर आ गया और एक हवालदार को बुला कर कुछ कहा. कुछ ही देर में तीन चार लोग एक गाडी लेकर आए और ड्राईवर की लाश को उठाकर ले गए.

यह उस ड्राईवर की लाश को कहाँ ले गए हैं? नंदिनी ने विजय से पूछा.

आज क्या हुआ था? विजय ने नंदिनी से प्रतिप्रश्न किया.

मतलब?

कमिश्नर का फोन आने पर तुमने उस ड्राईवर को रिहा कर दिया फिर?

...फिर हवालदार उसे वापस लेकर आया.

नही लाया.

नंदिनी ने विजय को सवालिया नज़र से देखा.

उस ड्राईवर ने यहाँ से छुटने के बाद आगे की सजा के डर से आत्महत्या कर ली. अभी कुछ ही देर में किसी गांववाले का थाने में फोन आएगा कि किसी पेड़ पर किसी लाश लटकी हुई हैं, हम जायेंगे और केस बनायेंगे.

..और अगर स्टाफ में से किसी ने बाहर खबर कर दी तो? नंदिनी ने परेशान होते हुए पूछा.

लोगो को एक आसान झूठ एक मुश्किल सच से कई गुना बेहतर लगता हैं. ये कहानी तुम्हारी वाली हकीकत से कई आसान हैं और ज्यादा भरोसेमंद भी...

तभी एक हवलदार आया. सर फोन आ गया हैं. उस हवालदार ने कहा.

तुम काफी थक चुकी हो. अब घर जाकर आराम करो. आगे मैं संभाल लूंगा. विजय ने कहा.

मगर....

मगर–वगर कुछ नही. तुम्हे मुझ पर विश्वास हैं न.

हां..बिलकुल. नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा.

तो तुम सब मुझ पर छोड़ दो और निश्चिंत होकर घर जाओ.

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05/02/2013

अब किस पर विश्वास करना हैं और किस पर नही कुछ समझ में नहीं आ रहा था. कल जो हुआ सब अप्रत्याशित था. आखिर राणा ने अंतस पर क्यों हमला किया था? और उस आदमी ने कहा था कि संगठन मुझसे दूर रहे. आखिर यह संगठन क्या हैं और वो लोग क्यों मुझे उससे दूर रखना चाहते हैं? कहीं अंतस का इस सगठन से कुछ लेना देना तो नही हैं? कहीं अंतस से मिलना मेरे लिए खतरनाक तो नही हैं. और अंतस कह रहा था कि उसके पास ज्यादा वक्त नही हैं, आखिर वो किस बात से डर रहा था?

इन सारे सवालो से ही कल से मेरा दिमाग घूम रहा था. मुझे अंतस से मिलने से डर लग रहा था, मगर मेरे लिए इन सवालो का जवाब जानना भी जरुरी था. आखिरकार अब ये मेरे वजूद का सवाल था.

मैंने अंतस को फोन लगाया.

तुम आज आ रही हो न? उसने सामने से पूछा.

हां...मगर तुम्हारे रूम पर नही..हम गार्डन में मिलेंगे.

हा...हा...हा...वो हंसने लगा. तुम्हारा डर मैं समझ सकता हूँ, मगर तुम भी तो मेरा डर समझो. अगर इस बार वो लोग आये तो मैं उनसे नही लड़ सकूँगा.

तो इस बात की क्या गारंटी हैं कि वो तुम्हारे रूम पर नही आयेंगे? मैंने भी अपना दिमाग चलाते हुए कहा.

हां, मुझे पता हैं इसीलिए मैंने कल शाम को ही होटल चेंज कर लिया हैं. आज तुम्हे होटल लीला में आना हैं.

होटल लीला! मैंने चौंकते हुए कहा. वो मेरे घर से कोई सौ किमी दूर हैं.

बिलकुल...तुम बस अपनी गली से बाहर आ जाना..वहां एक कार तुम्हे लेने आ जाएगी.

कार! मगर मैं उसे पहचानूंगी कैसे?

तुम पहचान जाओगी.

हम्म...ठीक हैं. मैंने फोन रखते हुए कहा.

मुझे वास्तव में घबराहट हो रही थी. फिर भी मुझे सच तो जानना ही था. सो मैंने फैसला कर लिया की मैं उससे मिल कर ही रहूंगी.

मैं 10.30 बजे तक तैयार होकर घर से निकल गयी. मैं गली के बाहर जाकर खड़ी हुई ही थी कि एक कार आकर रुकी. मैं उसकी और देखने लगी तभी कार का

दरवाजा खुला और एक आदमी बाहर निकला.

अरे! मैं चौंक गयी. यह तो वहीँ ऑटो वाले काका हैं, जिससे मैं अक्सर कोलेज जाती हूँ. उन्होंने सफ़ेद रंग के ड्राईवर वाले कपडे पहन रखे थे. बिलकुल वासी ही जैसे अमीर लोगो के ड्राईवर पहनते हैं.

काका! आप कार भी चलाते हैं. मैंने उन्हें देखते ही पूछा.

बैठो बिटियाँ. उन्होंने पीछे का दरवाजा खोलते हुए कहा.

बैठो मतलब? आप मुझे लेने के लिए आये हैं? आप अंतस को जानते है?

हां...आप जल्दी से कार में बैठिये...हमें देर हो रही हैं.

मैं कार मैं बैठ गयी और वो ड्राइव करने लगे.

काका..आप अंतस को कैसे जानते हैं?

बेटा...आप अभी बहुत-सी बाते नही जानते हो लेकिन अब सब जान जाओगे.

..मगर उस दिन जब हम अंतस को हॉस्पिटल लेकर गये थे उसदिन आप ऐसे बर्ताव कर रहे थे जैसे आप उसे जानते ही नही हो...और उस दिन जब उन लडको ने मुझे छेड़ा था....

मैं कहते कहते रुक गयी. अब मुझे समझ में आ रहा था कि यह सब कुछ मेरी समझ से बड़ा था. मैने कभी गौर ही नही किया था कि हर बार जब भी मैं किसी मुसीबत में होती थी हर बार इन काका का ऑटो ही मुझे लेने आता था.

बच्चे...अभी तुम्हे बहुत कुछ जानना हैं मगर अभी के लिए बस इतना समझ लो कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं तुम्हारी भलाई के लिए ही कर रहे हैं.

मैं पीछे हज़ारो सवालो से गिरी हुई चुपचाप बैठी रही....

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दो दिन मौसम शांत रहने के बाद आज फिर से आसमान में काली घटायें छा गयी थी। लगातार बिजलियाँ चमक रही थी। विजय थाने से नहाया था। दिन भर हुई कार्यवाही से वो काफी थक गया था। वो अभी कपडे पहन ही रहा था कि डोरबेल बजी। इतना लेट कौन हो सकता हैं? उसने मन ही मन सोचा। कहीं थाणे से तो कोई नही हैं? हो सकता हैं कोई इमरजेंसी हो। उसने फटाफट कपडे पहने और दरवाजा खोला, हाथ में बैग लिए नंदिनी खड़ी थी।
नंदिनी तुम यहाँ? इस वक्त....विजय ने कुछ चिंतित होते हुए कहा।
हाँ, वो मुझे घर पर अकेले काफी घबराहट हो रही थी तो मैं यहाँ आ गयी। उसने अंदर आते हुए कहा। सब ठीक से हो गया न, कोई प्रॉब्लम तो नही हुई। नंदिनी काफी परेशान लग रही थी और होना भी चाहिए, आखिर उसके करियर का सवाल था।
अंदर विजय के कपडे इधर उधर पड़े थे, घर भी पूरा अस्त व्यस्त था, विजय तेजी से अंदर गया और कपडे इकट्ठे कर अलमारी में रखने लगा।
नही कोई दिक्कत नही हुई। अब सब ठीक हैं। वैसे तुम फोन करके भी पूछ सकती थी। विजय ने कुछ पेपर ड्रावर में रखते हुए कहा।
क्यों, तुम्हे मेरा यहाँ आना अच्छा नही लगा? नंदिनी पलंग पर बैठी थी, उसने विजय को घूरते हुए कहा। विजय एक सेकंड के लिए रुक गया। उसने नंदिनी को देखा जैसे वो उसकी मनोस्थिति को समझना चाहता हो।
नही ऐसी तो कोई बात नही हैं...वो तो बस अँधेरा ही था सो...
तुमने खाना खा लिया? नंदिनी ने विजय को अनसुना सा करते हुए कहा।
नही मैं तो बस अभी आया हूँ..क्यों?
मैं तुम्हारे लिए खाना लेकर आई हूँ। नंदिनी ने बैग से टिफ़िन निकालते हुए कहा।
ओह थैंक्स, मगर तुमने इतनी तकलीफ क्यों की? विजय ने पास पड़ी कुर्सी पर बैठते हुए औपचारिकतावश पूछा.
विजय नंदिनी के इस अजीब बर्ताव से अचम्भे में था. उसे समझ में नही आ रहा था की नंदिनी उसके प्रति इतना लगाव क्यों दिखा रही हैं? कहीं वो दिन में उसके द्वारा की गयी मदद को अहसान मान कर उसका बदला चुकाने की कोशिश तो नही कर रही हैं.
नही ऐसा कुछ नही हैं, वो तो मैं बस थाने से थोडा जल्दी आ गयी थी तो मैंने सोचा की मेरे साथ-साथ तुम्हारे लिए भी खाना बना दूँ. वैसे भी तुम बाहर का खाना खा-खाकर पक गए होंगे तो मैंने सोचा की तुम्हे अपने हाथ का बकवास खाना भी टेस्ट करवा दूँ. नंदिनी ने हँसते हुए कहा. विजय भी हंसने लगा इसके बाद दोनों बैठ कर खाना खाने लगे.
वो लोग कौन थे? खाना खाते हुए नंदिनी ने पूछा.
कौन?
वही जो उस लाश को लेने के लिए आये थे.
नंदिनी तुम तो जानती ही हो पुलिस की नौकरी में अच्छे से ज्यादा बुरे लोगो से काम पड़ता हैं. उनका काम ही यहीं हैं...ठिकाने लगाना.
नंदिनी ने एक सेकंड के लिए विजय को घुरा.
खैर जो भी हो..आज तो बाल-बाल बच गए. नंदिनी ने राहत की सांस लेते हुए कहा. वे अब तक खाना खा चुके थे.
हां सो तो हैं..मगर फिर भी हमें सावधान रहना होगा. यह बात किसी भी तरह बाहर नही पहुंचनी चाहिए. वरना कुछ भी हो सकता हैं...
तभी बरसात शुरू हो गई. आसमान में गर्जन के साथ बिजलियाँ चमकने लगी. तेज हवाओ से खिड़कियाँ टकराने लगी. विजय उठा और उसने खिड़कियाँ बंद कर दी. कुछ देर बाद लाइट भी चली गयी. विजय ने ढूंढ कर एक मोमबती जला ली.
कुछ देर तक दोनों खामोश बैठे रहे. उन दोनों के बिच ख़ामोशी शोर मचा रही थी.
यह बरसात भी न...विजय ने कुछ बात छेड़ने की कोशिश की. आजकल बिन मौसम भी बरसात आ जाती हैं. उसने शब्द ढूढ़ते हुए कहा.
मगर यह तो बरसात का मौसम ही हैं. नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा.
हां मगर फिर भी तुम अब घर कैसे जाओगी?
अब यह चिंता का विषय था. नंदिनी अब तक इस बारें में सोचा ही नही था कि अगर बरसात बंद नही हुई तो वह घर कैसे जाएगी? ऊपर से रात भी काफी हो गयी थी. 10.30 बजे का वक्त हो गया था.
वैसे अगर तुम चाहो तो यहाँ रुक सकती हो. विजय ने एक विकल्प सुझाया जिसके चुने जाने के आसार वो जानता था कि नगण्य हैं.
हां मैं भी यहीं सोच रही थी काफी लेट हो गया हैं तो अभी जाना सही नही रहेगा.
विजय यह जवाब सुनकर चौंक गया. उसे इसकी बिलकुल भी उम्मीद नही थी. बल्कि उसके पास तो इसकी कोई तैयारी भी नहीं थी. उसके पास एक ही बेड था, और बिस्तर भी गिने चुने ही थे. ऊपर से छत भी टपक रही थी. उसे लगा था कि नंदिनी जाने की बात करेगी तो वो छोड़ आएगा. मगर यहाँ तो कुछ उल्टा ही हो गया था.

रात की 12.00 बज चुकी थी. बाहर मद्धम- मद्धम बारिश हो रही थी. अन्दर नंदिनी और विजय दोनों अब भी बैठे थे और अपनी ज़िन्दगी की कुछ बाते कर रहे थे.
वाह क्या बात हैं, आपने सारे एग्जाम फर्स्ट एटेम्पट में ही पास कर लिए, मुझे तो एंट्रेंस भी दो बार देना पड़ा था.
सारे नही...फाइनल में एक अटेम्प्ट लगा था. नंदिनी ने कुछ याद करते हुए कहा. उसकी आवाज एक दम धीमी हो गयी थी.
क्या हुआ तुम कुछ अपसेट हो गयी. विजय ने नंदिनी का चेहरा पढ़ते हुए कहा.
नहीं कुछ नही. नंदिनी ने ना में सर हिला दिया.
उस दिन जब हम याग्निक से मिलने गए थे तब भी तुम अपसेट थी, तुम याग्निक को कैसे जानती हो?
ऐसे ही वो मेरा पुराना दोस्त था. नंदिनी ने और भी धीरे से कहा.
तुम उससे प्यार करती थी?
नंदिनी ने चौंक कर विजय की तरफ देखा. तुम्हे कैसे पता?
उस दिन मैंने तुम्हारी आँखों में एक दर्द देखा था. ऐसा दर्द किसी को न पाने के कारण होता हैं या फिर किसी को खोने पर होता हैं.
खोया तो तुमने भी किसी को हैं. कौन थी वो?
मेरा पहला और आखिरी प्यार...अफ़सोस मैं उससे कभी इज़हार नही कर पाया.
इज़हार नही कर पाए मतलब, वो नही जानती थी की तुम उससे प्यार करते हो.
शायद जानती थी.... विजय ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी जैसे आगे कुछ बताना नही चाहता था.
क्या हुआ था?
नंदिनी कुछ लोग हमारी ज़िन्दगी में आते ही दूर जाने के लिए हैं. वो हमारे लिए यादें छोड़ जाते हैं और कई बार एक मकसद भी, जिसे पूरा करने के लिए हम अपनी ज़िन्दगी भी लगा सकते हैं.
सही कहा तुमने विजय. अगर जो मेरे साथ हुआ था अगर न हुआ होता तो आज मैं शायद यहाँ तक न पहुँच पाती.
विजय ने अपना एक हाथ नंदिनी के हाथ पर रख दिया. दोनों के बीच फिर एक खामोशी छा गयी. मोमबती भी अब पूरी ख़त्म हो गयी थी, उसकी लौ अब बुझने से पहले फडकने लगी थी. नंदिनी ने विजय के कंधे पर सिर रख दिया था. विजय ने नंदिनी की पीठ पर हाथ रखा और उसे अपने में समा लिया. मोमबती बुझ चुकी थी, चारो और अँधेरा हो गया.

सुबह जब नंदिनी उठी तो यह उसकी ज़िन्दगी की एक नयी शुरुआत थी. एक ही रात में विजय के साथ उसका रिश्ता पुरी तरह से बदल चूका था. मगर नंदिनी इससे खुश थी. शायद विजय ही वो इंसान था जिसके साथ वो अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ारना चाहती थी.
सुबह उठकर नंदिनी अपने घर गयी और वहां से तैयार होकर वापस थाने पहुंची. कुछ देर बाद नंदिनी ने हवालदार को आवाज लगाईं.
जी मैडम. हवालदार ने अन्दर आते हुए कहा.
मैंने तुम्हे ट्रांसपोर्ट ऑर्गनाइजेशन की मीटिंग के बारे में पता करने के लिए कहा था. कुछ पता चला?
हां..मैडम आज तो क्या इस पुरे महीने ट्रांसपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन की कोई मीटिंग नही हैं.
लगा ही था...और वो उस ड्राईवर का सामान कहाँ हैं?
लाकर में हैं मैडम.
लेकर आओ. इतने में विजय भी अन्दर आ गया था.
कुछ देर बाद हवालदार एक पैकेट लेकर आया. जिसमें ड्राईवर का पर्स, मोबाइल वगैरह थे.
नंदिनी ने जैसे ही पैकेट टेबल पर खाली किया एक चीज पर उसकी नज़र रुक गयी. यह गले में पहनने की चांदी की माला थी, जिसमें हु-ब-हु वहीँ त्रिशूल था जो उसने राणा के गले में देखा था.
हम्म...तो ये बात हैं. नंदिनी ने वापस हवालदार को बुलाया.
एक काम करो, मुझे भारत सेवा संस्थान के बारें में पूरी डिटेल निकालकर दो.
जी मैडम.
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